श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३ [ वाम स्तम्भ ] न प्रज्ञानघनस्त्वेवं न प्रज्ञोऽप्रज्ञ एव सः ॥ विदिते नास्ति वेद्यं च निर्वाणं परमार्थतः । अज्ञानतिमिरात्सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ ज्ञानं च बन्धनं चैव मोक्षो नाप्यात्मनो द्विजाः। न ह्येषा प्रकृतिर्जीवो विकृतिश्च विकारतः । विकारो नैव मायैषा सदसद्व्यक्तिवर्जिता ॥” तथाह भगवान्पाराशरः— “अस्माद्वि जायते विश्व- मत्रैव प्रविलीयते । स मायी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः ॥ न चात्रैवं संसरति न च संसारयेत्परम् । न कर्ता नैव भोक्ता च न च प्रकृतिपूरुषौ ॥ न माया नैव च प्राण- श्चैतन्यं परमार्थतः । [ दक्षिण स्तम्भ ] वाला है और न प्रज्ञानघन है। इसीलिये वह न प्रज्ञ (प्रकृष्ट ज्ञानवान्) है और न अप्रज्ञ ( ज्ञानहीन ) ही है। ज्ञान हो जानेपर तो कोई ज्ञेय ही नहीं रहता; अतः परमार्थतः निर्वाणस्वरूप ही है। सब कुछ अज्ञानान्धकारके ही कारण है। इसमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। हे द्विजगण ! आत्माका न ज्ञान होता है, न बन्धन होता है और न मोक्ष ही होता है। जीव न तो यह प्रकृति है, न विकृति है और न इनका विकार ही है, क्योंकि ये सब विकारी हैं। यह सब तो सत्-असत्से विलक्षण माया ही है।” तथा भगवान् पराशर कहते हैं— “इसीसे विश्व उत्पन्न होता है और इसीमें लीन हो जाता है। वह मायामय मायासे बँधकर स्वयं ही अनेक प्रकारके शरीर धारण कर लेता है। किन्तु इस प्रकार न तो वह स्वयं संसारको प्राप्त होता है और न किसी अन्यको ही संसारमें प्रवृत्त करता है क्योंकि वह न कर्ता है, न भोक्ता है, न प्रकृति या पुरुष है, न माया है और न प्राण है; वस्तुतः वह तो चैतन्य है। अतः