श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[वाम भाग]
भ्रान्तदृष्टिभिरात्मापि तथैकः सन्पृथक्पृथक् ॥” ( २ । १६ । १९-२० ) “एकः समस्तं यदिहास्ति किञ्चि- त्तदच्युतो नास्ति परततोऽन्यत् । सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेत- दात्मस्वरूपं त्यज भेदमोहम् ॥ इतीरितस्तेन स राजवर्य- स्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः । स चापि जातिस्मरणात्प्रबोध- स्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥” ( २ । १६ । २२—२४ )
तथा लैङ्गे— “तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम् । परतन्त्रे स्वतन्त्रे च भिदाभावाद्दिचारतः ॥ एकत्वमपि नास्त्येव द्वैतं तत्र कुतोऽस्त्यहो । एकं नास्त्यथ मर्त्यं च कुतो मृतसमुद्भवः ॥ नान्तःप्रज्ञो बहिष्प्रज्ञो न चोभयत एव च ।
[दक्षिण भाग]
देता है उसी प्रकार जिनकी दृष्टि भ्रमग्रस्त है उन लोगोंको आत्मा एक होनेपर भी पृथक्-पृथक् दिखायी देता है।” “इस जगत्में जो कुछ है वह सब एकमात्र श्रीहरि ही है; उनसे भिन्न और कुछ भी नहीं है। वही मैं हूँ, वही तुम हो और यह सारा जगत् भी आत्मस्वरूप श्रीहरि ही है। तुम भेदभ्रमको छोड़ दो। उस (अवधूत) के ऐसा कहनेपर उस सौवीरनरेशने परमार्थदृष्टिसे सम्पन्न हो भेदबुद्धि छोड़ दी, और उस ब्राह्मणने भी पूर्वजन्मका स्मरण रहनेसे तत्त्वज्ञान प्राप्त कर उसी जन्ममें मोक्षपद प्राप्त कर लिया।”
तथा लिङ्गपुराणमें कहा है— “अतः समस्त प्राणियोंको यह संसार अज्ञानके ही कारण प्राप्त हुआ है; क्योंकि विचार करनेपर स्वतन्त्र परमात्मा और परतन्त्र जीवमें कोई भेद नहीं है। अहो ! जब उसमें एकत्व भी नहीं है तो द्वैत कहाँसे हो सकता है? जब एक नहीं और कोई मर्त्य (मरणधर्मा) भी नहीं तो मृत्यु कहाँसे हो सकती है? वह न अन्तःप्रज्ञ (भीतरकी जाननेवाला) हैं, न बहिष्प्रज्ञ (बाहरकी जानने- वाला) है, न दोनों ओरकी जानने-