भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 276 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१ "परमार्थस्तु भूपाल "राजन् ! तुम मुझसे संक्षेपमें संक्षेपाच्छ्रूयतां मम ॥ परमार्थतत्त्व श्रवण करो । सर्वव्यापी, एको व्यापी समः शुद्धो सर्वत्र समभावसे स्थित, शुद्ध, निर्गुण, निर्गुणः प्रकृतेः परः । प्रकृतिसे अतीत, जन्म और वृद्धि जन्मवृद्ध्यादिरहित आदिसे रहित, सर्वगत एवं अविनाशी आत्मा सर्वगतोऽव्ययः ॥ आत्मा एक है । वह परम ज्ञानमय परज्ञानमयः सद्भि- है । हे राजन् ! उस प्रभुका र्नामजात्यादिभिः प्रभुः। वास्तविक नाम एवं जाति आदि- न योगवान्न युक्तोऽभू- से संयोग न तो है, न हुआ न्नैव पार्थिव योक्ष्यते ॥ है और न कभी होगा ही । तस्यात्मपरदेहेषु उसका अपने और दूसरोंके देहों- संयोगो ह्येक एव यत् । के साथ एक ही संयोग है । विज्ञानं परमार्थोऽसौ इस प्रकारका जो विशेष ज्ञान द्वैतिनोऽतथ्यदर्शिनः ॥" है वही परमार्थ है । द्वैतवादी तो (२।१४।२८-३१) अपरमार्थदर्शी हैं । हे विद्वन् ! इस "एवमेकमिदं विद्ब- प्रकार यह सारा जगत् वासुदेवसंज्ञक न्भेदि सकलं जगत् । परमात्माका एक अभिन्न स्वरूप वासुदेवाभिधेयस्य ही है ।" स्वरूपं परमात्मनः ॥" "[गुरुवर ऋभुके] इस उपदेशसे (२।१५।३५) निदाघ भी अद्वैतपरायण हो गया; "निदाघोऽप्युपदेशेन और तब वह समस्त प्राणियोंको तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥ आत्माके साथ अभेदरूपसे देखने सर्वभूतान्यभेदेन लगा तथा उसे ब्रह्मका साक्षात्कार हो स ददर्श तदात्मनः । गया । हे द्विज ! इससे उसने उत्कृष्ट तथा ब्रह्म ततो मुक्ति- मोक्षपद प्राप्त कर लिया । जिस प्रकार मवाप परमां द्विजः ॥ एक ही आकाश सफेद और नीले आदि सितनीलादिभेदेन भेदसे विभिन्न प्रकारका दिखायी यथैकं दृश्यते नभः ।

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 55, कुल 276 में से · BharatKosha