भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९ काल, स्वभाव आदिकी जगत्-कारणताका खण्डन इदानीं कालादीनि ब्रह्मकारण- | अब श्रुति ब्रह्मकारणवादके विरोधी वादप्रतिपक्षभूतानि विचारविषय- | कालादिको विचारके विषयरूपसे त्वेन दर्शयति— | प्रदर्शित करती है— कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या । संयोग एषां न त्वात्मभावा- दात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥ काल, स्वभाव, नियति, यदृच्छा, भूत और पुरुष—ये कारण हैं [ या नहीं ] इसपर विचारना चाहिये । इनका संयोग भी [ अपने शेषी ] आत्माके अधीन होनेके कारण कारण नहीं हो सकता तथा जीवात्मा भी सुख-दुःखके हेतु [ पुण्यापुण्य कर्मों ] के अधीन है । [ इसलिये वह भी कारण नहीं हो सकता ] ॥ २ ॥ कालः स्वभाव इति । योनि- | ‘कालः स्वभावः'इत्यादि। इन सबके शब्दः संबध्यते । कालो योनिः | साथ 'योनिः' शब्दका सम्बन्ध है। क्या कारणं स्यात् ? कालो नाम सर्व- | काल योनि—कारण हो सकता है ? भूतानां विपरिणामहेतुः। स्वभावः, | सम्पूर्ण भूतोंकी रूपान्तर-प्राप्तिमें जो स्वभावो नाम पदार्थानां प्रति- | हेतु हैं उसको काल कहते हैं । इसी नियता शक्तिः; अग्नेरौष्ण्यमिव । | प्रकार क्या स्वभाव कारण है ? पदार्थों- नियतिरविषमपुण्यपापलक्षणं कर्म | की नियत शक्तिका नाम स्वभाव है, तद्वा कारणम् ? यदृच्छाकास्मिकी | जैसे अग्निका स्वभाव उष्णता । | अथवा क्या नियति कारण है ? पुण्य- | पापरूप जो अविषम कर्म हैं वे | ‘नियति' कहे जाते हैं ? या यदृच्छा— १. जिनका फल कभी विपरीत नहीं होता ।