श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[संस्कृत-टीका] प्राप्तिः । भूतान्याकाशादीनि वा योनिः ? पुरुषो वा विज्ञानात्मा योनिः ? इतीत्थमुक्तप्रकारेण किं योनिरिति चिन्त्या चिन्त्यं निरूपणीयम् । केचिद्योनिशब्दं प्रकृतिं वर्णयन्ति । तस्मिन्यक्षे किं कारणं ब्रह्मेति पूर्वोक्तं कारण- पदमत्राप्यनुसंधेयम् । तत्र कालादीनामकारणत्वं (पार्श्व-टिप्पणी: कालादीनाम् अकारणत्वोपपादनम्) दर्शयति—संयोग एषामित्यादिना । अयमर्थः—किं काला- दीनि प्रत्येकं कारणमुत तेषां समूहः । न च प्रत्येकं कालादीनां कारणत्वं संभवति, दृष्टविरुद्ध- त्वात् । देशकालनिमित्तानां संह- तानामेव लोके कार्यकरत्वदर्श- नात् । न चाप्येषां कालादीनां संयोगः समूहः कारणम्, समूहस्य संहतेः परार्थत्वेन शेषत्वेन शेषिण आत्मनो विद्य-
[हिन्दी-अनुवाद] आकस्मिक घटना अथवा आकाशादि भूत कारण हैं ? या पुरुष यानी विज्ञानात्मा जगत्का कारण है ? इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे यह विचारना यानी बतलाना चाहिये कि इसमें कौन कारण है ? कोई 'योनिः' शब्दका अर्थ प्रकृति बतलाते हैं ? उस अवस्था में पूर्व मन्त्रमें 'किं कारणं ब्रह्म' इस प्रश्नमें आये हुए कारण- पदकी यहाँ भी अनुवृत्ति कर लेनी चाहिये । इसपर श्रुति 'संयोग एषाम्' इत्यादि वाक्यसे यह प्रदर्शित करती है कि काल आदि कारण नहीं है । इसका अभिप्राय यों समझना चाहिये—क्या काल, स्वभाव आदिमेंसे प्रत्येक ही कारण है अथवा उन सबका समूह ? कालादिमेंसे प्रत्येक तो कारण हो नहीं सकता, क्योंकि ऐसा मानना प्रत्यक्ष विरुद्ध है । लोकमें देश-कालादि निमित्तोंको परस्पर मिलकर ही कार्य करते देखा गया है । और इन कालादिका संयोग यानी समूह भी कारण नहीं हो सकता है; क्योंकि समूह यानी संहति परार्थ अर्थात् शेष है और उसका शेषी आत्मा विद्यमान है, अतः स्वतन्त्र न