भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१८) “जीवापेतं वाव किलेदं | “जीवसे रहित होकर यह शरीर ही म्रियते न जीवो म्रियत इति” | मरता है जीव नहीं मरता”, “जरा- (छा० उ० ६ । ११ । ३) । | मृत्यु ये शरीरके धर्म हैं”, “हे “जरामृत्यू शरीरस्य” । “अवि- | मैत्रेयि ! यह आत्मा अविनाशी और नाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्ति- | अनुच्छित्तिधर्मा ( कभी उच्छिन्न न धर्मा”(बृ०उ० ४।५।१४) इति। | होनेवाला ) है ।” ऐसा ही स्मृति तथा च स्मृतिः— “अजः शरीर- | भी कहती है— “वह अजन्मा ग्रहणात्स जात इतिकीर्त्यते” इति। | शरीरग्रहण करनेसे 'जन्म लेता है' किं च, जीवाम केन—केन वा | ऐसा कहा जाता है ।” | इसके सिवा [ एक प्रश्न यह वयं सृष्टाः सन्तो जीवामेति | है—] हम किसके द्वारा जीवित रहते हैं? | अर्थात् उत्पन्न होनेपर हम किसके स्थितिविषयः प्रश्नः । क्व च | द्वारा जीवन धारण करते हैं ? इस | प्रकार यह स्थितिविषयक प्रश्न है । संप्रतिष्ठाः प्रलयकाले स्थिताः ? | तथा कहाँ प्रतिष्ठित होते हैं—प्रलय- | कालमें किसमें स्थित रहते हैं ? और अधिष्ठिता नियमिताः केन सुखे- | हे ब्रह्मविद्गण ! किसके द्वारा अधिष्ठित | अर्थात् प्रेरित होकर सुखासुख यानी तरेषु सुखदुःखेषु वर्तामहे ब्रह्म- | सुख-दुःखमें व्यवस्था (संसार-यात्रा ) विदो व्यवस्थां हे ब्रह्मविदः | को वर्तते हैं ? अर्थात् हे ब्रह्मवेत्ताओ ! | हम किसके द्वारा प्रेरित होकर सुख- सुखदुःखेषु व्यवस्थां केना- | दुःखमें व्यवस्था ( लोक-यात्रा ) का धिष्ठिताः सन्तोऽनुवर्तामह इति | अनुवर्तन करते हैं ? इस प्रकार | किम् इत्यादि प्रश्नसमूह जगत्की सृष्टिस्थितिम्रलयनियमहेतुः कि- | उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और नियमके मिति प्रश्नसंग्रहः ॥ १ ॥ | हेतुके विषयमें है ॥१॥