भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७


[संस्कृत-मूल]

अथवा किं कारणं ब्रह्म सिद्धिरूपम् उपादानभूतं किमित्यर्थः । अथवा बृहति बृंहयति तस्मादुच्यते परं ब्रह्मेति श्रुत्यैव निर्वचनान्निमित्तो- पादानयोरुभयोर्वा प्रश्नः किं कारणं ब्रह्मेति । किं कारणं ब्रह्माहोस्वित्कालादि ? अथवा कारणमेव ? कारणत्वेऽपि किं निमित्तमुतोपादानम् ? अथवा- भयम् ? तद्वा किंलक्षणमिति वक्ष्यमाणपरिहारानुरूपेण तन्त्रे- णावृत्त्या वा प्रश्नेऽपि संग्रहः कर्तव्यः; प्रश्नापेक्षत्वात्परि- हारस्य । कुतः स्म जाताः कुतो वयं कार्यकरणवन्तो जाताः ? स्वरूपेण जीवानामुत्पत्त्याद्यसंभवात् । तथा च श्रुतिः—"न जायते म्रियते वा विपश्चिद्" (क० उ० १।२।


[हिन्दी-अनुवाद]

[ यदि कारण है तो वह उपादान आदि कारणोंमेंसे] कौन-सा कारण है ? यानी स्वतःसिद्ध ब्रह्म क्या जगत्‌का उपादान कारण है ? अथवा “बढ़ा हुआ है तथा बढ़ाता है इसलिये परब्रह्म कहा जाता है” इस प्रकार श्रुतिद्वारा ही ब्रह्मशब्दकी व्युत्पत्ति की जानेके कारण उसके निमित्त और उपादान दोनों ही प्रकारके कारण होनेके विषयमें ‘ब्रह्म कौन कारण है’ ऐसा यह प्रश्न है । [ तात्पर्य यह है कि ] क्या जगत्‌का कारण ब्रह्म है अथवा कालादि ? या ब्रह्म कारण ही नहीं है ? यदि कारण है भी तो निमित्त कारण है या उपादान अथवा दोनों ? और उसका लक्षण क्या है ? आगे इस प्रकार जो परिहार कहा गया है उसके अनुसार उन सब विषयोंका एक साथ अथवा अलग-अलग प्रश्नमें भी संग्रह कर लेना चाहिये, क्योंकि परिहार तो प्रश्नकी अपेक्षा करके ही होता है । हम कहाँसे उत्पन्न हुए हैं—देह और इन्द्रियसम्पन्न हम लोगोंकी किससे उत्पत्ति हुई है ? क्योंकि स्वरूपसे तो जीवोंके जन्मादि होने सम्भव हैं नहीं । ऐसी ही ये श्रुतियाँ भी हैं—“यह मेधावी आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है”,