श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ जगत्-कारण ब्रह्मके स्वरूपके विषयमें ब्रह्मवादी ऋषियोंका विचार ब्रह्मवादिनो वदन्तीत्यादि । 'ब्रह्मवादिनो वदन्ति' इत्यादि श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषत् । श्वेताश्वतरशाखाकी मन्त्रोपनिषद् है। उसकी यह सङ्क्षिप्त टीका आरम्भ की तस्या अल्पग्रन्था वृत्तिरारभ्यते— जाती है— हरिः ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति— किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १ ॥ ॐ ब्रह्मवेत्तालोग कहते हैं—जगत्का कारणभूत ब्रह्म कैसा है ? हम किससे उत्पन्न हुए हैं ? किसके द्वारा जीवित रहते हैं ? कहाँ स्थित हैं ? और हे ब्रह्मविद्गण ! हम किसके द्वारा सुख-दुःखमें प्रेरित होकर व्यवस्था (संसारयात्रा) का अनुवर्तन करते हैं ? ॥ १ ॥ ब्रह्मवादिनो वदन्तीत्यादि । 'ब्रह्मवादिनो वदन्ति' इत्यादि । जो ब्रह्मवादी थे अर्थात् जिनका ब्रह्मवादिनो ब्रह्मवदनशीलाः सर्वे स्वभाव ब्रह्मचर्चा करनेका था ऐसे लोग सब-के-सब मिलकर चर्चा करने संभूय वदन्ति किं कारणं ब्रह्म लगे—'किं कारणं ब्रह्म' (जगत्का कारणभूत ब्रह्म कैसा है ?) किम् किमिति स्वरूपविषयोऽयं प्रश्नः । इत्यादि वाक्यसे ब्रह्मके स्वरूपके विषयमें प्रश्न किया गया है । अथवा अथवा कारणं ब्रह्माहोस्चित्कालादि इस जगत्का कारण ब्रह्म है या 'कालः स्वभावः' आदि वाक्यसे आगे बताये 'कालः स्वभावः' इति वक्ष्यमाणम् । जानेवाले काल आदि । अथवा ब्रह्म