भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५


[मूल संस्कृत (वाम स्तम्भ)] र्तयोरपि तथा संभवात्स्थूलोऽहं कृशोऽहमिति देहात्मनोरध्यासानु- भवात् । “हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥” (क० उ० १ । २ । १९) इत्यादिश्रुतिदर्शनाद् “य एनं वेत्ति हन्तारम्” (गीता २ । १९) “प्रकृतेः क्रियमाणानि” (गीता ३ । २७) इतिस्मृति- दर्शनाच्चाध्यासस्य प्रहाणाया- त्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तय उपनिषदा- रम्यते ।


[हिन्दी अनुवाद (दक्षिण स्तम्भ)] आत्माका भी अध्यास होना सम्भव है तथा 'मैं स्थूल हूँ' 'मैं कृश हूँ' इस प्रकार देह और आत्माके अध्यासका अनुभव भी होता ही है, एवं “यदि मारनेवाला होकर किसीको मारना चाहता है अथवा मारा जानेवाला होकर अपनेको मारा हुआ मानता है तो वे दोनों ही आत्माको नहीं जानते, क्योंकि यह आत्मा तो न मारता है और न मारा जाता है” इत्यादि श्रुति देखी जाती है तथा “जो इसे मारनेवाला समझता है” “प्रकृतिके गुणोंसे किये जाते हुए कर्मोंको” इत्यादि स्मृति-वाक्य भी देखे जाते हैं; इसलिये इस अध्यासके नाश और आत्माकी एकताका बोध कराने- वाले ज्ञानकी प्राप्तिके लिये यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है।