श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१ ൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘ ओष्ठनासिकयोर्मध्ये | ओष्ठ और नासिकाके मध्यमें, हृदये नाभिमण्डले । | हृदयमें, नाभिमण्डलमें तथा पैरोंके पादाङ्गुष्ठाश्रितः प्राणः | अँगूठोंमें भी रहता हुआ शरीरके सर्वाङ्गेषु च तिष्ठति ॥ | सभी अङ्गोंमें विद्यमान है। नित्यप्रति नित्यं षोडशसंख्याभिः | सोलह प्राणायामोंका अभ्यास करे, प्राणायामं समभ्यसेत् । | इससे मनोवाञ्छित पदार्थ प्राप्त होते मनसा प्रार्थितं याति | हैं और वह योगाभ्यासी समस्त सर्वप्राणजयी भवेत् ॥ | प्राणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है। प्राणायामैर्दहेद्दोषान् | साधकको चाहिये कि प्राणायामद्वारा धारणाभिश्च किल्विषान् । | शारीरिक दोषोंको भस्म करे, धारणा- प्रत्याहाराच्च संसर्गान् | से पापोंका नाश करे, प्रत्याहारसे ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ | वैषयिक संसर्गोंका अन्त करे और प्राणायामशतं स्नात्वा | ध्यानसे अनीश्वर गुणोंकी निवृत्ति यः करोति दिने दिने । | करे। जो पुरुष प्रतिदिन स्नान मातापितृगुरुघ्नोऽपि | करके सौ प्राणायाम करता है वह त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥” | यदि माता, पिता या गुरुकी हत्या तदेतदाह प्राणानित्यादिना— | करनेवाला हो तो भी तीन वर्षमें | उस पापसे मुक्त हो जाता है।” | यही बात ‘प्राणान्’ इत्यादि मन्त्रसे | बतलायी जाती है--
प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत । दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ६ ॥ साधकको चाहिये कि युक्त आहार-विहार करता हुआ प्राणोंका निरोध कर जब प्राणशक्ति (प्राणधारणका सामर्थ्य) क्षीण हो जाय तब
१४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ नासिकारन्ध्रद्वारा उसे बाहर निकाल दे। और फिर वह विद्वान् पुरुष दुष्ट अश्वसे युक्त रथके सारथिके समान सावधान होकर मनका नियन्त्रण करे ॥९॥ प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः | जिसकी चेष्टा “नात्यश्नतस्तु “नात्यश्नतः” (गी० ६।१६) | योगोऽस्ति”इत्यादिश्लोकमें बतलाये हुए इति श्लोकोक्तप्रकारेण संयुक्ता | नियमके अनुसार संयुक्त यानी संयत चेष्टा यस्य स संयुक्तचेष्टः। क्षीणे | है उसे संयुक्तचेष्ट कहते हैं। प्राणके शक्तिहान्या तनुत्वं गते मनसि | क्षीण होनेपर अर्थात् प्राणशक्तिका नासिकायाः पुटाभ्यां शनैः शनै- | ह्रास होनेसे मनके तनु हो जानेपर रुत्सृजेन्न मुखेन। वायुं प्रतिष्ठाप्य | नासिकारन्ध्रोके द्वारा धीरे-धीरे श्वास शनैर्नासिकयोत्सृजेदिति। उदा- | बाहर निकाले, मुखसे नहीं। तात्पर्य त्ताश्वयुतं रथनियन्तारमिव मननेन | यह है कि वायुको रोककर फिर उसे मनो धारयेताप्रमत्तः प्रणिहि- | धीरे-धीरे नासिकासे निकाले। फिर तात्मा ॥९॥ | अप्रमत्त—सावधान रहकर उद्धत | घोड़ोंवाले रथके सारथिके समान | मनको मनन करनेसे रोके ॥९॥ ध्यानके लिये उपयुक्त स्थानोंका निर्देश समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः । मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥ जो समतल, पवित्र, शर्करा, अग्नि और बालूसे रहित तथा शब्द, जल और आश्रयादिसे भी शून्य हो, मनके अनुकूल हो एवं नेत्रोंको पीड़ा देनेवाला न हो ऐसे गुहा आदि वायुशून्य स्थानमें मनको युक्त करे ॥१०॥
[अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
[अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
[संस्कृत-भाष्य] सम इति । समे निम्नोन्नत- रहिते देशे । शुचौ शुद्धे। शर्करा- वह्निवालुकाविवर्जिते । शर्कराः क्षुद्रोपलाः, वालुकास्तच्चूर्णम् । तथा शब्दजलाश्रयादिभिः । शब्दः कलहादिध्वनिः जलं सर्वप्राण्युपभोग्यम् । मण्डप आ- श्रयः । मनोऽनुकूले मनोरमे चक्षु- पीडने प्रतिवाद्यभिमुखे । छान्दसो विसर्गलोपः । गुहानिवाताश्रयणे गुहायामेकान्ते निवाते समाश्रित्य प्रयोजयेत्प्रयुञ्जीत चित्तं परमा- त्मनि ॥ १०॥
[हिन्दी-अनुवाद] 'समे' इत्यादि । सम अर्थात् जो देश ऊँचाई-नीचाईसे रहित हो, तथा जो शुचि—शुद्ध हो, शर्करा, अग्नि और वालूसे रहित हो—शर्करा छोटे-छोटे पत्थरके टुकड़ोंको और बालू उनके चूरेको कहते हैं—तथा शब्द, जल और आश्रयादिसे भी शून्य हो, यानी शब्द—कलह आदिके कोलाहल, समस्त प्राणियोंके उपयोगमें आनेवाले जल (पनघट) और आश्रय— जनसाधारणके ठहरनेके स्थानसे रहित हो, मनोऽनुकूल-मनोरम हो, नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला अर्थात् जहाँ कोई विरोधी सामने [न] हो। यहाँ 'चक्षु- पीडने' में चक्षुःके विसर्गका लोप वैदिक है। ऐसे गुहादि एकान्त और वायुशून्य स्थानमें बैठकर चित्तको प्रयुक्त करे अर्थात् परमात्मा- में लगावे ॥ १० ॥
योगसिद्धिके पूर्वलक्षण
[संस्कृत-भाष्य] इदानीं योगमभ्यस्यतोऽभि- व्यक्तिचिह्नानि वक्ष्यन्ते नीहार इत्यादिना—
[हिन्दी-अनुवाद] अब 'नीहार०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा योगाभ्यासीको प्रकट होनेवाले ब्रह्माभिव्यक्तिके पूर्वचिह्न बतलाये जाते हैं—
नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
१४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥११॥ योगाभ्यास आरम्भ करनेपर पहले अनुभव होनेवाले कुहरे, धूम, सूर्य, वायु, अग्नि, खद्योत (जुगनू), विद्युत्, स्फटिकमणि और चन्द्रमा इनके रूप ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करनेवाले होते हैं ॥११॥ नीहारस्तुषारः । तद्वत्प्राणैः | नीहार कुहरेको कहते हैं, प्राणों- समा चित्तवृत्तिः प्रवर्तते । ततो | के सहित चित्तवृत्ति कुहरेके समान | प्रवृत्त होने लगती है ।* उसके धूम इवाभाति । ततोऽर्कवत्ततो | पश्चात् धूआँ-सा भासने लगता है । | फिर सूर्यवत् और उसके पश्चात् वायुरिवाभाति । ततो वह्निरिवा- | वायु-सा प्रतीत होता है । तदनन्तर | वायु अग्निके समान अत्यन्त उष्ण त्युष्णो वायुः प्रकाशदहनः प्रव- | एवं प्रकाश और दाह करनेवाला र्तते । बाह्यवायुरिव संक्षुभितो | जान पड़ता है तथा बाह्यवायुके | समान अत्यन्त क्षुभित होकर बड़ा बलवान्विजृम्भते । कदाचित्ख- | बलवान् जान पड़ता है । कभी द्योतखचितमिवान्तरिक्षमालक्ष्यते । | जुगनुओंसे जगमगाता हुआ-सा आकाश विद्युदिव रोचिष्णुरालक्ष्यते | दिखायी देने लगता है, कभी | विद्युत्के समान तेजोमयी वस्तु दीखती कदाचित्स्फटिकाकृतिः । कदा- | है, कभी स्फटिकका आकार दीख चित्पूर्णशशिवत् । एतानि रूपाणि | पड़ता है और कभी पूर्ण चन्द्रमा-सा | दिखायी देता है । ब्रह्मानुसन्धानके योगे क्रियमाणे ब्रह्मण्याविष्क्रिय- | प्रयोजनसे किये जानेवाले योगमें ये माणे निमित्ते पुरःसराण्यग्रगा- | सब रूप पहले दिखायी देते हैं । | इसके पश्चात् परमयोगकी सिद्धि मीणि । तदा परमयोगसिद्धिः ११ | होती है ॥११॥
- अर्थात् अभ्यासकालमें मनोवृत्तिके सामने कुहरा-सा छा जाता है ।
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५ रोग, जरा और अकालमृत्युपर विजय पानेके चिह्न पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥१२॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाशकी अभिव्यक्ति होनेपर अर्थात् पञ्चभूतमय योग-गुणोंका अनुभव होनेपर जिसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो गया है उस योगीको न रोग होता है, न वृद्धावस्था प्राप्त होती है और न उसकी असामयिक मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥ लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च । गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥१३॥ शरीरका हल्कापन, नीरोगता, विषयासक्तिकी निवृत्ति, शारीरिक कान्तिकी उज्ज्वलता, स्वरकी मधुरता, सुगन्ध और मल-मूत्रकी न्यूनता— इन सबको योगकी पहली सिद्धि कहते हैं ॥१३॥ पृथ्वीति । पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे | 'पृथ्व्यप्तेजो०' इत्यादि । 'पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे' इस पदसे पृथिव्यादीनि भूतानि द्वन्द्वैक- | समाहारद्वन्द्वसमाससम्बन्धी एकवद्भाव- वद्भावेन निर्दिश्यन्ते । तेषु | द्वारा पृथिवी आदि पाँच भूतोंका निर्देश किया गया है । उन पाँचों पञ्चसु भूतेषु समुत्थितेषु पञ्चात्मके | भूतोंके प्रकट होनेपर अर्थात् पञ्चात्मक योगगुणके प्रवृत्त होनेपर योगगुणे प्रवृत्त इत्यस्य व्याख्यानम्। | —इस प्रकार यह इसकी व्याख्या कः पुनर्योगगुणः प्रवर्तते ? | है । वह कौन योगगुण प्रवृत्त होता
१४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
पृथिव्या गन्धवत्या गन्धो योगिनो | है ? [ सो बतलाते हैं—] गन्धवती भवति । तथाद्भ्यो रसः । एव- | पृथिवीका गुण गन्ध उस योगीको मन्यत्र । उक्तं च— | अनुभव होता है तथा जलसे रस- “ज्योतिष्मती स्पर्शवती | की प्रवृत्ति होती है । इसी प्रकार तथा रसवती परा । | अन्य भूतोंके विषयमें समझना गन्धवत्यपरा प्रोक्ता | चाहिये । कहा भी है— “ज्योति- चतस्रस्तु प्रवृत्तयः॥ | ष्मती, स्पर्शवती और रसवती आसां योगप्रवृत्तीनां | तथा इनसे भिन्न एक गन्धवती—ये यद्येकापि प्रवर्तते । | योगीकी चार प्रवृत्तियाँ कही गयी हैं। प्रवृत्तयोगं तं प्राहु- | इन योगप्रवृत्तियोंमेंसे यदि एककी र्योगिनो योगचिन्तकाः ॥” | भी प्रवृत्ति हो जाय तो योगिजन उस | साधकको योगमें प्रवृत्त हुआ | बतलाते हैं ।” न तस्य योगिनो रोगो न | उस योगीको न रोग होता है, | न वृद्धावस्था होती है और न मृत्यु- जरा न मृत्युर्वा प्रभवति । कस्य ? | का ही उसपर प्रभाव होता है । | किसे ? जिसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् । | हो गया है अर्थात् जिसे ऐसा शरीर | प्राप्त हो गया है कि जिसके दोषसमूह योगाग्निसंप्लुष्टदोषकलापं शरीरं | योगाग्निसे भस्म हो गये हैं । शेष | ( तेरहवें मन्त्रका ) अर्थ स्पष्ट प्राप्तस्य । स्पष्टमन्यत् ॥१२-१३॥ | है ॥१२-१३॥
योगसिद्धि या तत्त्वज्ञानका प्रभाव किञ्च— | तथा— यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् ।
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७
तद्द्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः ॥१४॥ जिस प्रकार मृत्तिकासे मलिन हुआ बिम्ब (सोने या चाँदीका टुकड़ा) शोधन किये जानेपर तेजोमय होकर चमकने लगता है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्त्वका साक्षात्कार कर अद्वितीय, कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता है ॥ १४ ॥ यथैवेति । यथैव बिम्बं सौवर्णं | 'यथैव' इत्यादि । जिस प्रकार राजतं वा मृदयोपलिप्तं मृदादिना | सुवर्ण या रजतका पिण्ड पहले | मिट्टीसे भरा हुआ अर्थात् मिट्टी मलिनीकृतं पूर्वं पश्चात्सुधान्तं | आदिसे मलिन हुआ रहनेपर फिर सुधौतमित्यस्मिन्नर्थे सुधान्तमिति | सुधान्त अर्थात् अग्नि आदिसे सुधौत | यानी निर्मल किये जानेपर तेजोमय च्छान्दसम् । अग्न्यादिना विम- | होकर चमकने लगता है—मूलमें लीकृतं तेजोमयं भ्राजते । तद्वा | 'सुधौतम्' के अर्थमें 'सुधान्तम्' यह तदेवात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य दृष्ट्वैको- | प्रयोग वैदिक है—उसी प्रकार | आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करनेपर ऽद्वितीयः कृतार्थो भवते वीत- | जीव अद्वितीय, कृतार्थ और शोक- शोकः । परेषां पाठे तद्वात्सत्तत्त्वं | रहित हो जाता है। अन्य शाखाओं- | में जहाँ 'तद्वात्सत्तत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही' प्रसमीक्ष्य देहीति । तत्राप्ययमे- | ऐसा पाठ है । वहाँ भी यही अर्थ वार्थः ॥ १४ ॥ | है ॥ १४ ॥
योगसिद्ध या तत्त्वज्ञकी स्थिति कथं ज्ञात्वा वीतशोको भवति ? | किस प्रकार जानकर जीव इत्याह— | शोकरहित होता है, सो श्रुति बतलाती है—
१४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् । अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१५॥ जिस समय योगी दीपकके समान प्रकाशस्वरूप आत्मभावसे ब्रह्म- तत्त्वका साक्षात्कार करता है उस समय उस अजन्मा, निश्चल और समस्त तत्त्वोंसे विशुद्ध देवको जानकर वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥१५॥ यदेति । यदा यस्यामवस्था- | 'यदा' इत्यादि । जिस समय यामात्मतत्त्वेन स्वेनात्मना । किं- | अर्थात् जिस अवस्थामें आत्मतत्त्व- | से--अपने आत्मस्वरूपसे, कैसे विशिष्टेन ? दीपोपमेन दीपस्था- | आत्मस्वरूपसे ? दीपोपम--दीपक- | स्थानीय अर्थात् प्रकाशस्वरूपसे ब्रह्म- नीयेन प्रकाशस्वरूपेण ब्रह्मतत्त्वं | तत्त्वका साक्षात्कार करता है । यहाँ प्रपश्येत् । तुशब्दोऽवधारणे । | 'तु' शब्द निश्चयार्थक है । अतः | तात्पर्य यह है कि परमात्माको परमात्मानमात्मनैव जानीयादि- | आत्मभावसे ही जानना चाहिये । | कहा भी है—"उसने आत्माको ही त्यर्थः । उक्तं च—"तदात्मान- | जाना कि मैं ब्रह्म हूँ।" कैसे ब्रह्मका मेवावेदहं ब्रह्मास्मि” ( बृ० उ० | साक्षात्कार करता है ?--जो किसी १।४।१०) इति । कीदृ- | अन्यसे उत्पन्न नहीं हुआ, ध्रुव | अर्थात् अपने स्वरूपसे च्युत नहीं शम् ? अन्यस्मादजायमानं ध्रुवम- | होता और सम्पूर्ण तत्त्वों यानी प्रच्युतस्वरूपं सर्वतत्त्वैरविद्यात- | अविद्या और उसके कार्योंसे विशुद्ध- | असंस्पृष्ट है; उस देवको जानकर त्कार्यैर्विशुद्धमसंस्पृष्टं ज्ञात्वा देवं | जीव अविद्यादि समस्त पाशोंसे मुक्त मुच्यते सर्वपाशैरविद्यादिभिः।१५। | हो जाता है ॥ १५ ॥
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४९
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४९
परमात्मस्वरूपका वर्णन परमात्मानमात्मत्वेन विज्ञानी- | परमात्माको आत्मभावसे जाने— यादित्युक्तं तदेव संभावय- | यह कहा गया, अब उसीका | सम्भावन (सम्मान) करते हुए मन्त्र न्नाह— | कहता है— एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥१६॥ यह देव ही सम्पूर्ण दिशा-विदिशा है, यही [हिरण्यगर्भरूपसे] पहले उत्पन्न हुआ था, यही गर्भके अन्तर्गत है, यही उत्पन्न हुआ है और यही उत्पन्न होनेवाला है। यह समस्त जीवोंमें प्रतिष्ठित और सर्वतोमुख है ॥१६॥ एष हेति । एष एव देवः | 'एष ह' इत्यादि । यह देव ही प्रदिशः प्राच्याद्या दिश उपदि- | प्रदिश अर्थात् पूर्वादि सम्पूर्ण दिशा शश्च सर्वाः, पूर्वो ह जातः सर्व- | और उपदिशाएँ हैं, यह हिरण्यगर्भ- | रूपसे सबसे पहले उत्पन्न हुआ था, स्माद्धिरण्यगर्भात्मना, स उ गर्भे- | यही गर्भके भीतर विद्यमान है, यही ऽन्तर्वर्तमानः, स एव जातः शिशुः, | शिशुरूपसे उत्पन्न हुआ है, यही स जनिष्यमाणोऽपि, स एव सर्वांश्च | उत्पन्न होनेवाला भी है, यही समस्त जनान्प्रत्यङ् तिष्ठति, सर्वप्राणि- | जीवोंमें प्रत्यङ्—अन्तरात्मरूपसे | स्थित है, समस्त प्राणियोंके मुख गतानि मुखान्यस्येति सर्वतो- | इसीके हैं, इसलिये यह सर्वतोमुख मुखः ॥ १६ ॥ | है ॥ १६ ॥
१५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧ इदानीं योगवत्साधनान्तराणि | अब योगके समान नमस्कारादि | अन्य साधनोंको भी कर्त्तव्यरूपसे नमस्कारादीनि कर्तव्यत्वेन दर्श- | प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति यितुमाह— | कहती है— यो देवो अग्नौ यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश । य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥१७॥ जो देव अग्निमें है, जो जलमें है और जिसने सम्पूर्ण भुवनको व्याप्त कर रखा है तथा जो ओषधि और वनस्पतियोंमें भी विद्यमान है उस देवको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १७ ॥ यो देव इति । यो विश्वं | ‘यो देवो’ इत्यादि । जिसने भुवनं स्वेन विरचितं संसार- | सम्पूर्ण भुवनको अर्थात् स्वयं रचे | हुए संसारमण्डलको व्याप्त कर रखा मण्डलमाविवेश । य ओषधीषु | है, जो शालि आदि ओषधियोंमें और शाल्यादिषु वनस्पतिष्वश्वत्थादिषु | अश्वत्थादि वनस्पतियोंमें भी विद्यमान तस्मै विश्वात्मने भुवनमूलाय | है उस विश्वात्मा—जगत्के मूल | कारण परमेश्वरको नमस्कार है, परमेश्वराय नमो नमः। द्विर्वच- | नमस्कार है । ‘नमः’ शब्दकी द्विरुक्ति नमादरार्थमध्यायपरिसमाप्त्यर्थं | आदरके लिये और अध्यायकी च ॥ १७ ॥ | समाप्तिके लिये है ॥ १७ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ ❧❦❧❦❧
तृतीय अध्याय
तृतीय अध्याय ——— एक ही परमात्मामें शासक और शासनीयभावका समर्थन कथमाद्वितीयस्य परमात्मन | अद्वितीय परमात्मामें शासक और शासनीय आदि भाव कैसे रह सकते हैं?—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है— ईशित्रीशितव्यादिभावः ? इत्याशङ्क्याह— य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानी- शत ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्वि- दुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥ जो एक जालवान् (मायावी) अपनी ईश्वरीय शक्तियोंसे शासन करता है, जो अकेला ही ऐश्वर्यसे योग होनेपर और जगत्के प्रादुर्भावके समय अपनी शक्तियोंसे सम्पूर्ण लोकोंका शासन करता है, उसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ १ ॥ य एक इति । य एकः पर- | 'य एको' इत्यादि । जो एक परमात्मा है वह जालवान् है । मात्मा स जालवान् जालं माया | दुस्तर होनेके कारण जाल मायाका नाम है । भगवान्ने भी ऐसा ही कहा दुरत्ययत्वात् । तथा चाह भग- | है कि "मेरी मायाको पार करना कठिन है।" उस जालसे जो युक्त वान्—"मम माया दुरत्यया" | है वह [ परमात्मा ] जालवान् है । (गी० ७।१४) इति । तद्वां- | 'तत् अस्य अस्ति' (वह उसका है)* इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'जालवान्' स्तदस्यास्तीति जालवान्मायावी- | शब्द सिद्ध होता है । जालवान् ————————————————————————————————
- 'तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्' (५।२।९४) इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ 'मतुप्' प्रत्यय करके 'मादुपधायाश्च मतोर्वो ० ० ०' (८।२।९) इस सूत्रसे 'म'का 'व' आदेश होता है।
१५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ त्यर्थः। ईशत ईष्टे मायोपाधिः सन्। | अर्थात् मायावी परमेश्वर मायोपाधिक | होकर शासन करता है। किनके कैः ? ईशनीभिः स्वशक्तिभिः। | द्वारा शासन करता है ? [ इसके | उत्तरमें कहते हैं-] 'ईशनीभिः' अपनी तथा चोक्तम्—ईशत ईशनीभिः | शक्तियोंके द्वारा । इसी आशयसे | यहाँ ऐसा कहा है—'ईशते ईश- परमशक्तिभिरिति। कान्? सर्वांल्लो- | नीभिः।' 'ईशनीभिः' अर्थात् अपनी | परम शक्तियोंके द्वारा शासन करता कानीशत ईशनीभिः । कदा ? | है। किनका शासन करता है ? वह | उन शक्तियोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका उद्भवे विभूतियोगे सम्भवे प्रादु- | शासन करता है । किस समय ? | उद्भव—अर्थात् विभूतियों (ऐश्वर्यों) र्भावे च । य एतद्विदुरमृता | से योग होनेपर और सम्भव जगत्के | प्रादुर्भावके समय । जो इसे जानते अमरणधर्माणो भवन्ति ॥ १ ॥ | हैं वे अमृत — अमरणधर्मा ( अमर ) | हो जाते हैं ॥१॥ कस्मात्पुनर्जालवान् ? इत्या- | किन्तु वह मायावी कैसे है ? शङ्क्य आह— | ऐसी आशङ्का करके कहते हैं— एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु- र्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः । प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्त- काले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥२॥ क्योंकि एक ही रुद्र है, इसलिये [ ब्रह्मविद्गण ] उससे भिन्न किसी अन्य वस्तुके लिये अपेक्षा नहीं करते । वह अपनी [ ब्रह्मादि ] शक्तियों- द्वारा इन लोकोंका शासन करता है वह समस्त जीवोंके भीतर स्थित है,
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५३ और सम्पूर्ण लोकोंकी रचना कर उनका रक्षक होकर प्रलयकालमें उन्हें संकुचित कर लेता है ॥ २ ॥
[मूल संस्कृत शाङ्करभाष्य] एको हीति । हिशब्दो यस्मा- दर्थे । यस्मादेक एव रुद्रः स्वतो न द्वितीयाय वस्त्वन्तराय तस्थु- र्ब्रह्मविदः परमार्थदर्शिनः । उक्तं च—एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुरिति । य इमाँल्लोकानीशते नियमयतीशनीभिः । सर्वांश्च जना- न्प्रत्यन्तरः प्रतिपुरुषमवस्थितः । रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यर्थः । किञ्च, संचुकोच अन्तकाले प्रलयकाले । किं कृत्वा ? संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा गोप्ता भूत्वा । एतदुक्तं भवति—अद्वि- तीयः परमात्मा, न चासौ कुम्भ- कारवदात्मानं केवलं मृत्पिण्ड- स्थानीयमुपादानकारणमुपादत्ते । किं तर्हि ? स्वशक्तिविक्षेपं कुर्वन्स्रष्टा नियन्ता वाभिधीयत इति । उत्तरो मन्त्रस्तस्यैव विराडात्मनावस्थानं
[हिन्दी अनुवाद] 'एको हि' इत्यादि । क्योंकि एक ही रुद्र है, अतः परमार्थदर्शी ब्रह्मविद्गण स्वतः किसी दूसरी वस्तु- के लिये अपेक्षा नहीं करते । यहाँ 'हि' शब्द 'यस्मात्' ( क्योंकि ) के अर्थमें है । इसीसे कहा है 'एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः ।' जो अपनी शक्तियोंद्वारा इन लोकोंका शासन-नियमन करता है । वह समस्त जीवोंके भीतर अर्थात् प्रत्येक पुरुषमें स्थित है । तात्पर्य यह है कि प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है । तथा वह अन्तकाल यानी प्रलय- कालमें संकुचित करता है। क्या करके? सम्पूर्ण लोकोंकी रचना कर उनका गोपा-रक्षक होकर । यहाँ यह कहा गया है कि परमात्मा अद्वितीय है, वह कुम्हारकी तरह मृत्पिण्डरूप अपने-आपको उपादान कारणरूपसे ग्रहण नहीं करता; तो फिर क्या करता है ? वह अपनी शक्तिको क्षुब्ध करनेसे ही जगत्का रचयिता या नियन्ता कहा जाता है । अगला मन्त्र उसीकी विराड्रूपसे स्थिति
१५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ तत्स्रष्टृत्वं प्रतिपादयति ॥ २ ॥ और उसके जगत्कर्तृत्वका प्रतिपादन करता है ॥ २ ॥ परमेश्वरसे जगत्की सृष्टिका प्रतिपादन विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रै- र्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ॥ ३ ॥ वह सब ओर नेत्रोंवाला, सब ओर मुखोंवाला, सब ओर भुजाओंवाला और सब ओर पैरोंवाला है। वह एकमात्र देव ( प्रकाशमय परमात्मा ) द्युलोक और पृथिवीकी रचना करता हुआ [ वहाँके मनुष्य-पक्षी आदि प्राणियोंको ] दो भुजाओं और पतत्रों ( पैरों एवं पंखों ) से युक्त करता है* ॥ ३ ॥
- इस मन्त्रके उत्तरार्द्धका अर्थ अन्यान्य टीकाकारोंने अनेक प्रकारसे किया है । प्रस्तुत अर्थ शांकरभाष्यके अनुसार है । शंकरानन्दजी इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं—“हस्ताभ्यां विश्वमुत्पादयन्नुत्पत्तिकोले विविधान्शब्दानुत्पाद्योत्पाद- कादिरूपेण करोति । बाहुभ्यामिति द्विवचनसामर्थ्यात्सर्वकर्महेतुत्वाच्च धर्माधर्माभ्या- मिति विवक्षितम् ।......यद्यपि धमतिरग्निसंयोगार्थस्तदापि सन्तापकारित्वेन सुख- दुःखयोरुत्पत्तौ स्थितौ संहारे च सुखदुःखकारित्वं व्याख्येयम् । संपतत्रैः पतनशीलैः पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतैर्न परमाणुभिः......धमतीत्यनुषङ्गः ।” अर्थात् वह हाथोंसे विश्वको उत्पन्न कर उसकी उत्पत्तिके समय उत्पाद्य-उत्पादकादिरूपसे अनेक प्रकारके शब्द करता है । ‘बाहुभ्याम्’ इस पदमें द्विवचन है तथा हाथ समस्त कर्मोंके हेतु होते हैं, इसलिये इस पदसे ‘धर्माधर्मके द्वारा’ यह अर्थ बतलाना अभीष्ट है । जिस समय ‘धमति’ क्रियाका अर्थ अग्निसंयोग लिया जाय उस समय भी सन्तापकारक होनेके कारण सुख-दुःखकी उत्पत्ति-स्थिति और संहारमें उनका सुख-दुःखकारित्व ही बतलाना चाहिये । ‘संपतत्रैः’—पतनशील पञ्चीकृत महाभूतोंसे युक्त करता है, परमाणुओंसे नहीं । नारायणतीर्थ लिखते हैं—“बाहुभ्यां विद्याकर्मभ्यां संधमति पतत्रैः वासनारूपैः संधमति दीपयति जीवनिष्ठविद्याकर्मवासनादिभिरीश्वरो जगत्प्रव-
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ 𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍 विश्वतश्चक्षुरिति । सर्वप्राणि- | 'विश्वतश्चक्षुरत' इत्यादि । गतानि चक्षूंष्यस्येति विश्वत- | समस्त प्राणियोंके चक्षु इस परमात्मा- | के ही हैं, इसलिये यह विश्वतश्चक्षु श्चक्षुः । अतः स्वेच्छयैव सर्वत्र | है । अतः अपनी इच्छामात्रसे ही | इसमें सर्वत्र चक्षु यानी रूपादिको चक्षू रूपाद्यौ सामर्थ्यं विद्यत इति | ग्रहण करनेका सामर्थ्य है । इसी | प्रकार आगे [ विश्वतोमुखः आदि ] विश्वतश्चक्षुः । एवमुत्तरत्र योज- | में भी अर्थयोजना कर लेनी चाहिये । | वह दो भुजाओंद्वारा संयुक्त करता नीयम् । सं बाहुभ्यां धमति संयो- | है; धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं जयतीत्यर्थः; अनेकार्थत्वाद्धात्तू- | [ इसीसे अग्निसंयोगके अर्थमें प्रयुक्त | होनेवाले 'धमति' का अर्थ संयोजन नाम् । पक्षिणश्च धमति द्विपदो | लिया गया है ] । तथा पक्षियों और | दो पैरोंवाले मनुष्यादिको पंतत्रों मनुष्यादींश्च पतत्रैः । किं कुर्वन् ? | ( पंखों और पैरों ) से युक्त करता | है । क्या करता हुआ ? द्युलोक द्यावापृथिवी जनयन्देव एको | और पृथिवीकी सृष्टि करता हुआ । विराजं सृष्टवानित्यर्थः ॥ ३ ॥ | तात्पर्य यह है कि उस एकमात्र | देवने विराट्की रचना की ॥३॥ र्तयतीत्यर्थः ।” अर्थात् बाहु—विद्या और कर्मद्वारा तथा पतत्र-वासनाओंद्वारा संधमति—दीप्त करता है; अर्थात् जीवनिष्ठ विद्या और कर्मादिके द्वारा ईश्वर जगत्- को प्रवृत्त करता है। विज्ञानभगवान् कहते हैं—"बाहुभ्यां मनुष्यादीन्संधमति संयोजयति*** पतत्रैः पतनसाधनैः पादैः संधमति***अथवा पतत्रैः पक्षैः पक्षिणः संधमति ।” अर्थात् वह मनुष्यादिको भुजाओंसे युक्त करता है और पतत्र—चलनेके साधन यानी पैरोंसे युक्त करता है । अथवा पतत्र यानी पक्षोंसे पक्षियोंको युक्त करता है। १. 'पतत्र' शब्दका अर्थ है पतनसे बचानेवाला । अतः मनुष्योंके विषयमें इसका अर्थ पैर समझना चाहिये और पक्षियोंके विषयमें पक्ष ।
१५६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१५६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ परमेश्वरका स्तवन इदानीं तस्यैव सूत्रसृष्टिं प्रति- | अब उसी परमात्माकी हिरण्यगर्भ- पादयन्मन्त्रदृगभिप्रेतं प्रार्थयते— | सृष्टिका प्रतिपादन करती हुई | श्रुति मन्त्रदर्शी ऋषियोंके अभिमत | अर्थके लिये प्रार्थना करती है— यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ४ ॥ जो रुद्र देवताओंकी उत्पत्ति तथा ऐश्वर्यप्राप्तिका हेतु, जगत्पति और सर्वज्ञ है तथा जिसने पहले हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया था, वह हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ ४ ॥ यो देवानामिति । यो देवा- | 'जो देवानाम्' इत्यादि । जो नामिन्द्रादीनां प्रभवहेतुरुद्भव- | देवताओंकी अर्थात् इन्द्रादिकी हेतुश्च । उद्भवो विभूतियोगः । | उत्पत्तिका और उद्भवका हेतु है । विश्वाधिपो विश्वाधिपः पाल- | उद्भव विभूतियोगको कहते हैं । जो | विश्वाधिप—विश्वका स्वामी अर्थात् यिता । महर्षिः—महांश्चासावृषि- | पालन करनेवाला है, महर्षि-महान् श्चेति महर्षिः सर्वज्ञ इत्यर्थः । | ऋषि यानी सर्वज्ञ है, हित-रमणीय हितं रमणीयमत्युज्ज्वलं ज्ञानं | अर्थात् अत्यन्त उज्ज्वल ज्ञान जिसका गर्भोऽन्तःसारो यस्य तं जनया- | गर्भ—अन्तःसार है उस [ हिरण्य- | गर्भ ] की जिसने पहले—सृष्टिके मास पूर्वं सर्गादौ । स नोऽस्मान् | आरम्भमें रचना की थी वह हमें शुभ बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु परम- | बुद्धिसे संयुक्त करे; अर्थात् हम पदं प्राप्नुयामेति ॥ ४ ॥ | परमपद प्राप्त करें ॥ ४ ॥
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 पुनरपि तस्य स्वरूपं दर्शयन्न- | फिर भी [ आगेके ] दो मन्त्रोंसे भिप्रेतमर्थं प्रार्थयते मन्त्रद्वयेन— | उसके स्वरूपको प्रदर्शित करती हुई श्रुति अभिप्रेत अर्थके लिये प्रार्थना करती है— या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥५॥ हे रुद्र ! तुम्हारी जो मङ्गलमयी, शान्त और पुण्यप्रकाशिनी मूर्ति है, हे गिरिशन्त ! उस पूर्णानन्दमयी मूर्तिके द्वारा तुम [ हमारी ओर ] देखो ॥ ५ ॥ या ते रुद्रेति । हे रुद्र तव या | 'या ते रुद्र' इत्यादि । हे रुद्र ! शिवा तनूरघोरा । उक्तं च “तस्यैते | तुम्हारी जो मङ्गलमयी अघोरा (शान्त) मूर्ति है । अन्यत्र ऐसा ही कहा भी तनुवौ घोरान्या शिवान्या” इति । | है— “उसकी ये दो आकृतियाँ हैं, अथवा शिवा शुद्धाविद्यातत्कार्य- | एक घोरा है और दूसरी मङ्गलमयी” । विनिर्मुक्ता सच्चिदानन्दाद्वयब्रह्म- | अथवा [ तुम्हारी जो मूर्ति ] शिवा— शुद्धा यानी अविद्या और उसके रूपा न तु घोरा शशिविम्बमि- | कार्योंसे रहित सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूपा है, घोरा नहीं है, अपि तु वाह्लादिनी । अपापकाशिनी स्मृ- | चन्द्रमण्डलके समान आह्लादकारिणी तिमात्राघनाशिनी पुण्याभिव्यक्ति- | है; तथा अपापकाशिनी—स्मरणमात्र- से ही पापोंका नाश करनेवाली करी । तयात्मना नोऽस्माञ्छन्त- | अर्थात् पुण्यकी अभिव्यक्ति करनेवाली मया सुखतमया पूर्णानन्दरूपया | है, अपनी उस शन्तम–सुखतम–पूर्णानन्दरूप मूर्ति (देह) से हे गिरिशन्त! हे गिरिशन्त गिरौ स्थित्वा शं | —गिरिमें रहकर शं–सुखका विस्तार सुखं तनोतीति । अभिचाकशीहि | करनेवाले ! हमें देखो—हमारी ओर
१५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ अभिपश्य निरीक्षस्व श्रेयसा नि- | दृष्टिपात करो अर्थात् हमें कल्याण- योजयस्वेत्यर्थः ॥ ५ ॥ | पथसे युक्त करो ॥ ५ ॥ किञ्च— | तथा— यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिꣲसीः पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥ हे गिरिशन्त ! जीवोंकी ओर फेंकनेके लिये तुम अपने हाथमें जो बाण धारण किये रहते हो, हे गिरित्र ! उसे मङ्गलमय करो, किसी जीव या जगत्की हिंसा मत करो ॥ ६ ॥ यामिषूमिति । यामिषुं गिरि- | 'यामिषुम्' इत्यादि । हे गिरि- शन्त हस्ते बिभर्षि धारयस्यस्तवे | शन्त ! तुम जीवोंकी ओर छोड़नेके लिये जो बाण धारण किये रहते हो, जने क्षेप्तुं शिवां गिरित्र गिरिं | हे गिरित्र ! —पर्वतकी रक्षा करनेके त्रायत इति तां कुरु । मा हिंसीः | कारण भगवान् गिरित्र हैं—उसे शिव ( मङ्गलमय ) करो। हमारे किसी पुरुषमस्मदीयं जगदपि कृत्स्नम् । | पुरुषकी और सारे जगत्की भी हिंसा मत करो। यहाँ इस अभिप्रेत अर्थकी साकारं ब्रह्म प्रदर्शयेत्यभिप्रतमर्थं | प्रार्थना की है कि हमें सम्पूर्ण साकार प्रार्थितवान् ॥ ६ ॥ | ब्रह्मके दर्शन कराओ ॥ ६ ॥ परमात्मतत्त्वके ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति इदानीं तस्यैव कारणात्मना- | अब उस परमात्माकी ही जगत्- वस्थानं दर्शयञ्ज्ञानादमृतत्व- | के कारणरूपसे स्थिति दिखलाती हुई श्रुति ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति माह— | दिखलाती है—
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९
ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितार- मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
उस [ पुरुषयुक्त जगत् ] से परे जो ब्रह्म-हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट एवं महान् है, जो समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरके अनुसार (परिच्छिन्नरूपसे) छिपा हुआ है तथा विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है उस परमेश्वरको जानकर जीवगण अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥
[संस्कृत भाष्यम्] ततः परमिति । ततः पुरुष- युक्ताज्जगतः परं कारणत्वात्कार्य- भूतस्य प्रपञ्चस्य व्यापकमित्यर्थः । अथवा ततो जगदात्मनो विराजः परम् । किं तद्ब्रह्मपरं बृहन्तं ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात्परं बृहन्तं महद्व्यापित्वात् । यथानिकायं यथाशरीरं सर्वभूतेषु गूढमन्तर- वस्थितं विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं सर्वमन्तः कृत्वा स्वात्मना सर्वं व्याप्यावस्थितमीशं परमेश्वरं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
[भाष्यार्थ] 'ततः परम्' इत्यादि । जो उससे यानी पुरुषयुक्त जगत्से परे है अर्थात् कारण होनेसे अपने कार्य- भूत जगत्में व्यापक है, अथवा जो उससे—जगद्रूप विराट्स परे है, वह क्या है ? इसके उत्तरमें श्रुति कहती है—ब्रह्मपरं बृहन्तम् । जो ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भरूप कार्यब्रह्म- से पर और व्यापक होनेके कारण बृहत्—महान् है। तथा जो समस्त प्राणियोंमें यथानिकाय—उनके शरीर- के अनुसार गूढ—अन्तःस्थित है, एवं विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है अर्थात् सबको अपने भीतर करके— अपने स्वरूपसे सबको व्याप्त करके स्थित है। उस ईश—परमेश्वरको जानकर जीव अमर हो जाते हैं ॥७॥
१६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ परमेश्वरके विषयमें ज्ञानीजनोंके अनुभवका प्रदर्शन इदानीमुक्तमर्थं द्रढयितुं मन्त्र- | अब उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करने- | के लिये मन्त्रद्रष्टा ऋषिका अनुभव दृगनुभवं दर्शयित्वा पूर्णानन्दा- | दिखलाती हुई श्रुति यह प्रदर्शित द्वितीयब्रह्मात्मपरिज्ञानादेव परम- | करती है कि पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्म- | का आत्मस्वरूपसे ज्ञान होनेपर ही पुरुषार्थप्राप्तिर्नान्येनेति दर्शयति— | परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है, | अन्य किसी उपायसे नहीं— वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥ मैं इस अज्ञानातीत प्रकाशस्वरूप महान् पुरुषको जानता हूँ । उसे ही जानकर पुरुष मृत्युको पार करता है, इसके सिवा परमपदप्राप्तिका कोई और मार्ग नहीं है ॥ ८ ॥ वेदाहमेतमिति । वेद जाने | 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । मैं उस तमेतं परमात्मानम् । अथैतं प्रत्य- | परमात्माको जानता हूँ । यह जो गात्मानं साक्षिणं पुरुषं पूर्णं | प्रत्यगात्मा-साक्षी, पुरुष-पूर्ण, महान्तं सर्वात्मत्वात् । आदित्य- | और सर्वरूप होनेसे महान् तथा वर्णं प्रकाशरूपं तमसोऽज्ञानात् | आदित्यवर्ण-प्रकाशस्वरूप एवं तम परस्तात्तमेव विदित्वाति मृत्युमेति | यानी अज्ञानसे अतीत है इसे जानकर मृत्युमत्येति । कस्मात् ? अस्मा- | जीव मृत्युको पार कर लेता है; कैसे न्नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय | कर लेता है ? क्योंकि परमपदप्राप्तिके परमपदप्राप्तये ॥ ८ ॥ | लिये इससे भिन्न कोई और मार्ग | नहीं है ॥ ८ ॥