श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ यच्चान्यद्वाङ्मयं क्वचित् ॥ वेदानुवचनं यज्ञो ब्रह्मचर्यं तपो दमः । श्रद्धोपवासः स्वातन्त्र्य- मात्मनो ज्ञानहेतवः ॥" (याज्ञ० यति० १८९-१९०) तथा चाथर्वणे विशुद्धद्यपेक्ष- मात्मज्ञानं दर्शयति- "जन्मान्तरसहस्रेषु यदा क्षीणास्तु किल्बिषाः ॥ तदा पश्यन्ति योगेन संसारोच्छेदनं महत् ॥” (योगशिख० १ । ७८-७९) “यस्मिन्विशुद्धे विरजे च चित्ते य आत्मवत्पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ।” "तमेतं वेदानु- वचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन" (बृ० उ० ४ । ४ । २२) इति बृहदारण्यके विविदिषाहेतुत्वं यज्ञादीनां दर्शयति । जो कुछ शास्त्र हैं वे सब एवं वेदपाठ, यज्ञानुष्ठान, ब्रह्मचर्य, तप, इन्द्रियदमन, श्रद्धा, उपवास और स्वतन्त्रता (दूसरे किसीकी आशा न रखना) ये सब आत्मज्ञानके साधन हैं।" इसी प्रकार अथर्ववेदीय उपनिषद्में भी 'आत्मज्ञान चित्तशुद्धिकी अपेक्षा रखनेवाला है' यह दिखलाते हैं- "जिस समय सहस्रों जन्मोंके अनन्तर पाप क्षीण हो जाते हैं उसी समय पुरुष योगके द्वारा संसारका उच्छेद करनेवाला [ज्ञानरूप] महान् साधन देख पाते हैं।" "जिस चित्तके शुद्ध और निर्मल हो जानेपर जिनके दोष क्षीण हो गये हैं वे यतिजन सम्पूर्ण भूतोंको आत्मस्वरूप ही देखते हैं।" बृहदारण्यकमें भी “उस इस आत्माको ब्राह्मणगण वेद- पाठ, यज्ञ, दान, तप और उपवासके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं” इस वाक्यद्वारा श्रुति यज्ञादिको जिज्ञासाका हेतु प्रदर्शित करती है । वाचक शब्द] और कुछ स्वाभिमत पद रहते हैं उसे भाष्यका लक्षण जाननेवाले 'भाष्य' मानते हैं ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
ननु "विद्यां चाविद्यां च | पूर्व०-किन्तु "जो विद्या (ज्ञान) कर्मणामप्य- यस्तद्वेदोभय सह" | और अविद्या (कर्म) इन दोनोंको मृतत्वहेतुत्वम् (ईशा० उ० ११)। | साथ-साथ जानता है", "तप और "तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेय- | ज्ञान ये ब्राह्मणके निःश्रेयसके उत्कृष्ट सकरं परम्।" इत्यादिना कर्मणाम- | साधन हैं" इत्यादि वाक्योंसे तो प्यमृतत्वप्राप्तिहेतुत्वमवगम्यते । | कर्मोंका भी अमृतत्वकी प्राप्तिमें हेतु होना जान पड़ता है ? सत्यम्, अवगम्यत एव तद- | सिद्धान्ती-ठीक है, जान तो तच्च तदपे-पेक्षितशुद्धिद्वारेण न | पड़ता ही है; परन्तु ज्ञानके लिये क्षितशुद्धिद्वारेण च साक्षात् । तथा | अपेक्षित चित्तशुद्धिके द्वारा ही कर्मका न साक्षात् हि-"विद्यां चाविद्यां | अमृतत्वमें हेतुत्व है, साक्षात् नहीं। च" (ईशा० उ० ११) । "तपो | इसीसे "विद्यां चाविद्यां च" तथा विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं | "तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्।" इत्यादिना ज्ञानकर्मणोर्निः- | परम्" इत्यादि वाक्योंसे ज्ञान और श्रेयसहेतुत्वमभिधाय कथमनयो- | कर्मका निःश्रेयसमें हेतुत्व बतलाकर स्तद्धेतुत्वमित्याकाङ्क्षायां "तपसा | ऐसी जिज्ञासा होनेपर कि ये किस कल्मषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते।" | प्रकार उसके हेतु हैं- "तपसा कल्मषं "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया- | हन्ति विद्ययामृतमश्नुते"* और मृतमश्नुते" (ईशा० उ० ११) | "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृत- इतिवाक्यशेषेण कर्मणः कल्मष- | मश्नुते"† इन वाक्यशेषोंसे कर्मका क्षयहेतुत्वं विद्याया अमृतप्राप्ति- | पापक्षयमें कारणत्व और ज्ञानका हेतुत्वं प्रदर्शितम् । यत्र तु | अमृतत्वप्राप्तिमें हेतुत्व प्रदर्शित किया शुद्ध्याद्यवान्तरकार्यानुपदेशस्त- | है । और भी जहाँ कहीं शुद्धि आदि त्रापि शाखान्तरोपसंहारन्यायेनो- | अन्य कर्मोंका उपदेश दिखायी न दे वहाँ भी शाखान्तरोपसंहारन्यायसे‡
- तपसे पाप नष्ट करता है और ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है । † कर्मसे [ संसाररूप ] मृत्युको पार करके ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है । ‡ जहाँ एक ही जातिके कर्म या उपासनाका वेदकी विभिन्न शाखाओंमें वर्णन
२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[Header] २० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
पसंहारः कर्त्तव्यः । | उसका उपसंहार (संग्रह) कर लेना चाहिये । ननु "कुर्वन्नेवेह कर्माणि | पूर्व०-किन्तु "कर्म करते हुए [विद्याया मोक्षसाधनत्व-माक्षिपति] जिजीविषेच्छतं | ही सौ वर्षतक जीवित रहनेकी समाः” (ईशा० उ० | इच्छा करे” ऐसा जीवनपर्यन्त २) इति यावज्जीवकर्मानुष्ठाननियमे | कर्मानुष्ठानका नियम रहते हुए ज्ञान सति कथं विद्याया मोक्षसाधनत्वम् ? | मोक्षका साधन कैसे माना जा सकता है ? उच्यते—कर्मण्यधिकृतस्यायं | सिद्धान्ती-बतलाते हैं, यह [आक्षेपं परिहरति] नियमो नानधिकृत- | नियम कर्माधिकारीके ही लिये है, जो कर्मके अधिकार और शास्त्राज्ञासे स्यानियोज्यस्य ब्रह्मवादिनः । तथा | बाहर है उस ब्रह्मवेत्ताके लिये नहीं च विदुषः कर्मानधिकारं दर्शयति | है ! इसी प्रकार श्रुति भी ब्रह्मवेत्ताको कर्मके अधिकारसे बाहर दिखाती है- श्रुतिः—"नैतद्विद्वानृषिणा विधेयो | "यह ब्रह्मवेत्ता ऋषियोंकी आज्ञाके न रुध्यते विधिना शब्दचारः ।” | अधीन नहीं है और न यह शास्त्रका "एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसो- | अनुयायी होकर उसकी आज्ञासे रुक ऽग्निहोत्रं न जुहवाञ्चक्रिरे ।” “एतं | ही सकता है," "इसीलिये पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते थे,” वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः | “इस आत्मतत्त्वको जान लेनेपर पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकै- | ब्राह्मणलोग पुत्रैषणा, वित्तैषणा और षणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं | लोकैषणाको छोड़कर भिक्षाचर्या
[Footnote] हो, किन्तु शास्त्रभेदसे उनके फल या अनुष्ठानकी शैलीमें भेद दिखायी दे वहाँ अन्य शाखामें आये हुए अधिक अंशको सम्मिलित करके न्यूनताकी पूर्ति कर लेनी चाहिये । इसे शाखान्तरोपसंहारन्याय कहते हैं। इसका विशद वर्णन ब्रह्मसूत्रभाष्यके तृतीय अध्यायके तृतीय पादमें देखना चाहिये ।
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
चरन्ति” (बृ० उ० ३।५।१) | करते थे,” “ब्रह्मवेत्ता कावषेय “एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहु- | ऋषियोंने भी यही कहा है—हम ऋषयः कावषेयाः किमर्था वय- | किस प्रयोजनके लिये अध्ययन करें मध्येण्यामहे किमर्था वयं यक्ष्यामहे | और किस उद्देश्यकी पूर्तिके लिये यज्ञ स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात्ते- | करें ? वह किस प्रकार ब्रह्मनिष्ठ हो नेदृश एवेति।”यथाह भगवान्— | सकता है, जिस प्रकार भी हो ऐसा “यस्त्वात्मरतिरेव स्या- | (सर्वत्यागी) ही होगा।” जैसा दात्मतृप्तश्च मानवः । | कि श्रीभगवान् भी कहते हैं— आत्मन्येव च संतुष्ट- | “जो पुरुष आत्मामें ही प्रेम स्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ | करनेवाला, आत्मामें ही तृप्त नैव तस्य कृतेनार्थो | और आत्मामें ही सन्तुष्ट है, उसके नाकृतेनेह कश्चन । | लिये कुछ भी कर्त्तव्य नहीं है। उस न चास्य सर्वभूतेषु | पुरुषका इस लोकमें कर्म करनेसे कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥” | कोई प्रयोजन नहीं है और कर्म न (गीता ३। १७-१८) | करनेसे यहाँ उसे प्रत्यवाय आदि तथा चाह भगवान्परमेश्वरो | अनर्थकी भी प्राप्ति नहीं होती लैङ्गे कालकूटोपाख्याने— | तथा सम्पूर्ण भूतोंमें उसका कोई अर्थ- “ज्ञानेनैतेन विप्रस्य | व्यपाश्रय (अर्थसिद्धिका सहारा) त्यक्तसङ्गस्य देहिनः । | भी नहीं है।” कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा | लिङ्गपुराणमें कालकूटोपाख्यानमें अस्ति चेत्तत्त्वविन्न च ॥ | ऐसा ही भगवान् महेश्वर भी कहते इह लोके परे चैव | हैं—“हे द्विजेन्द्रगण ! इस ज्ञानकें कर्तव्यं नास्ति तस्य वै । | द्वारा निःसंग हुए जीवको कोई जीवन्मुक्तो यतस्तु स्या- | कर्त्तव्य नहीं रहता, यदि रहता है द्ब्रह्मवित्परमार्थतः ॥ | तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है। उसे इस | लोक और परलोकमें भी कोई कर्त्तव्य | नहीं है, क्योंकि वास्तवमें ब्रह्मवेत्ता | तो जीते हुए ही मुक्त हो जाता है।
श्वेता० २—
२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ज्ञानाभ्यासरतो नित्यं | परमार्थतत्त्वको जाननेवाला ज्ञाना- विरक्तो ह्यर्थवित्स्वयम् । | भ्यासमें तत्पर विरक्त पुरुष कर्तव्यकी कर्तव्यभावमुत्सृज्य | चिन्ता छोड़कर केवल ज्ञानहीको ज्ञानमेवाधिगच्छति ॥ | प्राप्त करता है। हे द्विजश्रेष्ठ ! जो वर्णाश्रमाभिमानी य- | वर्णाश्रमाभिमानी पुरुष ज्ञानदृष्टिको स्त्यक्त्वा ज्ञानं द्विजोत्तमाः। | त्यागकर मोहवश कहीं अन्यत्र सुख अन्यत्र रमते मूढः | मानता है वह अज्ञानी है, इसमें सोऽज्ञानी नात्र संशयः ॥ | सन्देह नहीं। क्रोध, भय, लोभ, क्रोधो भयं तथा लोभो | मोह, भेददृष्टि, मद, अज्ञान और मोहो भेदो मदस्तमः। | धर्माधर्म—ये सब ऐसे लोगोंको ही धर्माधर्मौ च तेषां हि | प्राप्त होते हैं और इनके अधीन तद्वशाच्च तनुग्रहः॥ | होनेपर देह धारण करना पड़ता शरीरे सति वै क्लेशः | है। तथा शरीरके रहते हुए क्लेश सोऽविद्यां संत्यजेत्ततः। | अवश्यम्भावी है। अतः जीवको अविद्यां विद्यया हित्वा | अविद्याका त्याग करना चाहिये। स्थितस्यैवेह योगिनः॥ | जो योगी विद्याद्वारा अविद्याका त्याग क्रोधाद्या नाशमायान्ति | करके स्थित है उसके क्रोधादि दोष धर्माधर्मौ च नश्यतः। | तथा धर्म और अधर्म इस लोकमें तत्क्षयाच्च शरीरेण | रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं। न पुनः संप्रयुज्यते ॥ | उनका क्षय होनेपर उसका फिर स एव मुक्तः संसारा- | शरीरसे संयोग नहीं होता, तथा दुःखत्रयविवर्जितः।।" | वही त्रिविध तापसे छूटकर संसारसे तथा शिवधर्मोत्तरे— | मुक्त हो जाता है।" "ज्ञानामृतेन तृप्तस्य | तथा शिवधर्मोत्तरमें कहा है— कृतकृत्यस्य योगिनः। | "जो योगी ज्ञानामृतसे तृप्त होकर नैवास्ति किञ्चित्कर्तव्य- | कृतकृत्य हो गया है उसके लिये मस्ति चेन्न स तत्त्ववित् । | कोई कर्तव्य नहीं रहता, और यदि | रहता है तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
लोकद्वयेऽपि कर्तव्यं | उसे दोनों लोकोंमें कोई कर्त्तव्य नहीं किञ्चिदस्य न विद्यते । | रहता वह सर्वथा पूर्ण और समदर्शी इहैव स विमुक्तः स्या- | होनेके कारण इस लोकमें ही मुक्त त्सम्पूर्णः समदर्शनः ॥” | हो जाता है ।” तस्माद्विदुषः कर्तव्याभावाद- | अतः विद्वान्के लिये कोई | कर्त्तव्य न होनेके कारण ‘कर्म विद्यावद्विषय एवायं कुर्वन्नेवे- | करता हुआ ही सौ वर्ष जीनेकी | इच्छा करे’ इत्यादि रूपसे कर्म त्यादिकर्मनियमः । कुर्वन्नेवेति | करनेका नियम केवल अज्ञानियोंके | ही लिये है । अथवा यह समझना च नायं कर्मनियमः किन्तु विद्या- | चाहिये कि ‘कुर्वन्नेव’ इत्यादि वाक्य | कर्मका नियामक नहीं है, माहात्म्यं दर्शयितुं यथाकामं | अपि तु ज्ञानकी महिमा दिखानेके | उद्देश्यसे [ज्ञानीके लिये] स्वेच्छानुसार कर्मानुष्ठानमेव द्रष्टव्यम् । एतदुक्तं | कर्मानुष्ठान प्रदर्शित करनेके लिये | ही है । इसके द्वारा यह बतलाया भवति-यावज्जीवं यथाकामं | गया है कि विद्वान् स्वेच्छासे जीवन- | पर्यन्त पुण्य-पापादिरूप कर्म करता पुण्यपापादिकं कुर्वत्यपि विदुषि | भी रहे तो भी ज्ञानके सामर्थ्यसे उसे | उन कर्मोंका लेप नहीं होगा । न कर्मलेपो भवति विद्यासामर्थ्या- | तात्पर्य यह है कि ‘ईशावास्यमिद | सर्वम्’ यहाँसे लेकर ‘तेन त्यक्तेन दिति । तथा हि-“ईशावास्य- | भुञ्जीथाः’ इस प्रथम मन्त्रसे सर्वकर्म- | परित्यागपूर्वक आत्मरक्षाका प्रतिपादन मिद सर्वम्” (ईशा० उ० १) | करनेपर वेद यह देखकर कि जिसके | लिये कोई भी विधि नहीं की जा इत्यारभ्य “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः” | सकती उस ब्रह्मवेत्ताके लिये | सर्वकर्मपरित्यागका विधान करना भी ( ईशा० उ० १) इति विदुषः | सर्वकर्मत्यागेनात्मपालनमुक्त्वा- | नियोज्ये ब्रह्मविदि त्यागकर्तव्य- |
२४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[Page Header] २४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[Left Column - संस्कृत पाठ] तोक्तिरप्ययुक्तैवोक्तेति मत्वा चकितः सन्वेदो विदुषस्त्याग- कर्तव्यतामपि नोक्तवान् । कुर्व- न्नेवेह लोके विद्यमानं पुण्य- पापादिकं कर्म यावज्जीवं जिजी- विषेत् । न पुण्यादिबन्धभयात्पु- ण्यादिकं त्यक्त्वा तूष्णीमवतिष्ठेत । एवं तावत्कर्माणि कुर्वत्यपि विदुषि त्वयीतो यावज्जीवानुष्ठाना- दन्यथाभावः स्वरूपात्प्रच्युतिः पुण्यादिनिमित्तसंसारान्वयो ना- स्ति । अथवेतः कर्मानुष्ठानोत्तर- कालभाव्यन्यथाभावः संसारान्वयो नास्ति । यस्मात्त्वयि विन्यस्तं न कर्म लिप्यते । तथा च श्रुत्य- न्तरम्—“न लिप्यते कर्मणा पापकेन” (बृ० उ० ४।४।२३)।
[Right Column - हिन्दी अनुवाद] अनुचित ही है, चकित हुआ; अतः यह दिखानेके लिये कि मैंने विद्वान्के लिये कर्मत्यागकी भी विधि नहीं की है, यह कहा है कि ज्ञानी इस लोकमें आजीवन यथाप्राप्त पुण्य- पापादि रूप कर्म करता हुआ जीनेकी इच्छा करे; उसे पुण्यादि फलके बन्धनके भयसे पुण्यादिको त्यागकर चुपचाप बैठनेकी आवश्य- कता नहीं है । * क्योंकि इस प्रकार यावज्जीवन कर्म करते रहनेपर भी तुझ ब्रह्मवेत्ताका अन्यथाभाव— स्वरूपच्युति अर्थात् पुण्यादिके कारण होनेवाला संसारका संसर्ग नहीं हो सकता । अथवा ‘इतः’ यानी कर्मानुष्ठानके पीछे होनेवाला अन्यथा- भाव—संसारका संसर्ग नहीं हो सकता । क्योंकि तुझ ब्रह्मवेत्तामें स्थापित कर्म लिप्त (संपृक्त) नहीं होता । ऐसी ही अन्य श्रुतियाँ भी हैं—'ज्ञानी पापकर्मोंसे लिप्त नहीं
[Footnote / पादटिप्पणी]
- ज्ञानीमें कर्तृत्वाभिमान नहीं होता और न उसकी भोगदृष्टि ही होती है। इसलिये किसी भी प्रकारकी वासना न रहनेके कारण वह न तो पुण्यफलकी प्राप्तिके लिये पुण्यकर्मोंमें ही प्रवृत्त होता है और न आसक्तिवश पापकर्म ही करता है। उसके प्रारब्धानुसार उससे जो कर्म होते हैं उनसे अन्य पुरुषोंका जो इष्ट या अनिष्ट होता है उसके कारण वे उनमें पुण्य या पापका आरोप कर लेते हैं। इसलिये उन्हींकी दृष्टिसे यहाँ ज्ञानीके कर्मोंको पुण्य-पाप विशेषणोंसे विशेषित किया है ! यदि अपने द्वारा होते हुए कर्मोंमें ज्ञानीकी पुण्य-पापदृष्टि रहेगी तो यह असम्भव है कि उसे उनका फल न भोगना पड़े । पुण्य-पापदृष्टि तो जीवकी होती है और ज्ञानीमें जीवत्वका अत्यन्ताभाव होता है ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५ “एवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते” | होता” “इस प्रकार जाननेवालेको ( छा० उ० ४ । १४ । ३ ) । | पापकर्मका संसर्ग नहीं होता”, “उसे “नैनं कृताकृते तपतः” ( बृ० | पुण्य-पाप सन्ताप नहीं दे सकते”, उ० ४ । ४ । २२) । “एवं | “इसी प्रकार इसके समस्त पाप नष्ट हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते” | हो जाते हैं ।” ( छा०उ०५ । २४ । ३ ) । | लैङ्गे— | लिङ्गपुराणमें कहा है— “इसी “ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि | प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोंको भस्म भस्मसात्कुरुते तथा ॥ | कर देता है । इसमें सन्देह नहीं कि ज्ञानिनः सर्वकर्माणि | ज्ञानीके समस्त कर्म जीर्ण हो जाते जीर्यन्ते नात्र संशयः । | हैं, वह नाना प्रकारके पाप-पुण्योंसे क्रीडन्नपि न लिप्येत | क्रीडा करता हुआ भी उनसे लिप्त पापैर्नानाविधैरपि ॥” | नहीं होता ।” शिवधर्मोत्तरेऽपि— | शिवधर्मोत्तरमें भी कहा है— “तस्माज्ज्ञानासिना तूर्ण- | “अतः वह तुरन्त ही सकाम या मशेषं कर्मबन्धनम् । | निष्कामभावसे किये हुए सम्पूर्ण कामाकामकृतं छित्त्वा | कर्मबन्धनको ज्ञानरूप खड्गसे | काटकर शुद्ध हो अपने आत्मामें शुद्धश्चात्मनि तिष्ठति ॥ | स्थित हो जाता है । जिस प्रकार यथा वह्निर्महान्दीप्तः | अत्यन्त प्रज्वलित हुआ अग्नि सूखे शुष्कमाद्रं च निर्दहेत् । | और गीले सब प्रकारके इन्धनको | जला डालता है उसी प्रकार ज्ञानाग्नि तथा शुभाशुभं कर्म | एक क्षणमें ही समस्त शुभाशुभ ज्ञानाग्निर्दहते क्षणात् ॥ | कर्मोंको भस्म कर देता है । जिस पद्मपत्रं यथा तोयैः | प्रकार कमलका पत्ता अपने ऊपर | पड़े हुए जलसे भी लिप्त नहीं होता, स्वस्थैरपि न लिप्यते । | उसी प्रकार ज्ञानी प्रारब्धवश अपनेको शब्दादिविषयाम्भोभि- | प्राप्त हुए शब्दादि विषयरूप जलसे
२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
स्तद्वज्ज्ञानी न लिप्यते ॥ लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार यद्वन्मन्त्रबलोपेतः मन्त्रबलसे सम्पन्न हुआ पुरुष सर्पोंके क्रीडन्सर्पेर्न दश्यते । साथ खेलते रहनेपर भी उनके द्वारा क्रीडन्नपि न लिप्येत नहीं डसा जाता उसी प्रकार ज्ञानी तद्वदिन्द्रियपन्नगैः ॥ इन्द्रियरूप सर्पोंके साथ क्रीडा करते रहनेपर भी उनसे लिप्त नहीं होता । मन्त्रौषधिवलैैर्यद्व- जिस प्रकार खाया हुआ विष भी ज्जीर्यते भक्षितं विषम् । मन्त्र और ओषधिके सामर्थ्यसे पच तद्वत्सर्वाणि पापानि जाता है उसी प्रकार ज्ञानीके सारे जीर्यन्ते ज्ञानिनः क्षणात् ॥” पाप एक क्षणमें नष्ट हो जाते हैं ।” तथा च सूत्रकारः—“पुरुषा- तथा सूत्रकार भगवान् व्यासजीने [स्वाभिमतसूत्र-] र्थोऽतः शब्दादिति भी “पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति [कृन्मतोपन्यासः] बादरायणः” ( ब्र० बादरायणः” इस सूत्रसे ज्ञानको ही सू० ३ । ४ । १) इति परमपुरुषार्थका हेतु बतलाकर फिर ज्ञानस्यैव परमपुरुषार्थहेतुत्वमभि- धाय “शेषत्वात्पुरुषार्थवादो ‘शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति
१. स्वतन्त्र साधनभूत इस ( औपनिषद आत्मज्ञान ) से मोक्षरूप पुरुषार्थ सिद्ध होता है, क्योंकि इसमें [ ‘तरति शोकमात्मवित्’ इत्यादि ] श्रुति प्रमाण है— ऐसा बादरायणाचार्यका मत है। २. इस सूत्रका विशद अर्थ इस प्रकार है—जैसे ‘व्रीहिभिर्यजेत’ इस व्रीहियागमें करणभूत व्रीहिके साथ ही उसका प्रोक्षण आदि भी यज्ञका अङ्ग माना जाता है उसी प्रकार आत्मा कर्तृरूपसे यज्ञ आदि कर्मका अंग होनेके कारण उसका ज्ञान भी उस कर्मका अङ्ग ही है। अतः आत्मज्ञानके महान् फलको बतानेवाली ‘तरति शोकमात्मवित्’ इत्यादि श्रुति शेषत्वात्--यज्ञादि कर्मोंका अङ्ग होनेके कारण पुरुषार्थवाद है अर्थात् पुरुष [ आत्मा ] की प्रशंसाके लिये अर्थवाद- मात्र है; जिस प्रकार कि अन्यान्य द्रव्यसंस्कारसम्बन्धी कर्मोंमें फलश्रुति अर्थवाद मानी जाती है। उदाहरणके लिये निम्नाङ्कित श्रुति है—‘यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति’ ( जिसकी पलाशकी ‘जुहू’ होती है वह कभी पापमय यशका श्रवण नहीं करता) यह फलश्रुति यज्ञसम्बन्धिनी जुहूसे सम्बन्ध रखनेवाले पलाशकी प्रशंसा करनेसे यज्ञकी ही अङ्गभूत है; अतः यज्ञशेष होनेसे अर्थवाद मानी
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७ यथा···" (ब्र० सू० ३।४।२) इत्यादिना कर्मापेक्षितकर्तृप्रति- पादकत्वेन विद्यायाः कर्मशेषत्व- माशङ्क्य "अधिकोपदेशात्तु बा- दरायणस्य···" (ब्र० सू० ३। ४।८) इत्यादिना कर्तृत्वादि- संसारधर्मरहितापहतपाप्मादिरूप- ब्रह्मोपदेशात्तद्विज्ञानपूर्विकां तु कर्माधिकारसिद्धिं त्वाशासानस्य कर्माधिकारहेतोः क्रियाकारकफल- लक्षणस्य समस्तस्य प्रपञ्चस्या- विद्याकृतस्य विद्यासामर्थ्यात्स्व- रूपोपमर्ददर्शनात्कर्माधिकारोच्छि- त्तिप्रसङ्गाद्भिन्नप्रकरणत्वाद्विन्न- कार्यत्वाच्च परस्परविकल्पः समु- जैमिनिः" इस सूत्रसे जैमिनिके मतानुसार कर्ममें अपेक्षित कर्ताका प्रतिपादन करनेवाली होनेसे विद्याके कर्मशेषत्वकी आशङ्का कर "अधिको- पदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात्" इस सूत्रसे यह बतलाया है कि विद्या कर्तृत्वादि सांसारिक धर्मोंसे रहित निष्पापादिरूप ब्रह्मका प्रतिपादन करती है, इसलिये जो पुरुष उसके ज्ञानपूर्वक कर्माधिकारकी सिद्धिकी आशा रखता है उसके कर्माधिकारके हेतुभूत अविद्याजनित क्रिया, कारक एवं फलरूप समस्त संसारके स्वरूपका विद्याके प्रभावसे विनाश देखा जानेके कारण कर्माधिकारके उच्छेदका प्रसंग उपस्थित होनेसे तथा कर्म और ज्ञानके भिन्न-भिन्न प्रकरण और भिन्न-भिन्न कार्य देखे जानेके कारण उनका आपसमें विकल्प, गयी है। ऐसा जैमिनिका मत है। अभिप्राय यह कि यज्ञादिका कर्ता और भोक्ता संसारी जीव ही शरीर छूटनेपर आत्मा या परात्मा शब्दसे कहा गया है। जो संसारी जीव है उसीके ज्ञानका महत्त्व वेदान्तमें बताया गया है। इस मतमें ईश्वरका अस्तित्व नहीं स्वीकार किया गया है। १. जैमिनिके पूर्वोक्त मतका खण्डन करते हुए कहते हैं—'अधिकोपदेशात्तु' इत्यादि। यदि कर्ता भोक्ता संसारी जीवका ही उपनिषद्की श्रुतियोंमें उपदेश किया गया होता तो उक्तरूपसे की हुई फलश्रुति अवश्य ही अर्थवाद हो सकती थी किन्तु वहाँ तो संसारी जीवकी अपेक्षा बहुत ही उत्कृष्ट असंसारी परमेश्वरका वेद्यरूपसे उपदेश किया गया है, इसलिये मुझ बादरायणका [ आत्मज्ञानसे मोक्षरूप पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, इत्यादि ] पूर्वोक्त मत ज्यों-का-त्यों ठीक ही है; क्योंकि 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतियोंमें उस उत्कृष्ट परमात्माके स्वरूपका उपदेश देखा जाता है।
२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ च्चयोऽङ्गाङ्गिभावो वा नास्तीति प्रतिपाद्य “अत एव चाग्नीन्धना- द्यनपेक्षा” ( ब्र० सू० ३।४। २५) इति विद्याया एव परम- पुरुषार्थहेतुत्वादग्नीन्धनाद्याश्रम- कर्माणि विद्यायाः स्वार्थसिद्धौ नापेक्षितव्यानीति पूर्वोक्तस्याधि- करणस्य फलमुपसंहृत्यात्यन्तमे- वानपेक्षायां प्राप्तायां “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” ( ब्र० सू० ३।४। २६ ) इति नात्य- न्तमनपेक्षा । उत्पन्ना हि विद्या फलसिद्धिं प्रति न किञ्चिदन्यद्- पेक्षते । उत्पत्तिं प्रत्यपेक्षत एव । समुच्चय अथवा अङ्गाङ्गिभाव कुछ भी नहीं हो सकता *-ऐसा प्रतिपादन करके “अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा” इस सूत्रसे 'विद्या ही परमपुरुषार्थकी हेतु होनेके कारण वह अपने प्रयोजनकी पूर्तिमें अग्नि-इन्धनादिसे निष्पन्न होने- वाले आश्रम-कर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखती' इस प्रकार पूर्वोक्त अधिकरणके फलका उपसंहार कर ज्ञानप्राप्तिमें कर्मकी अत्यन्त अनपेक्षा प्राप्त होनेपर “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” इस सूत्रसे यह बतलाया है कि कर्मकी बिल्कुल ही अपेक्षा न हो- ऐसी बात नहीं है, अपि तु विद्या उत्पन्न हो जानेपर ही अपने फलकी सिद्धिमें किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं रखती, अपनी उत्पत्तिमें तो उसे कर्मकी अपेक्षा है ही, क्योंकि
- वेदमें कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड ये दोनों अलग-अलग हैं तथा ज्ञानसे मोक्ष और कर्मोंसे स्वर्गादिकी प्राप्ति होती है; इसलिये इनके फल भी अलग-अलग हैं । अतः इन दोनोंका परस्पर न तो विकल्प ( एक ही प्रयोजनके लिये दोनोंमेंसे किसी एकका अनुष्ठान ), न समुच्चय ( दोनोंका एक साथ अनुष्ठान ) और न अङ्गाङ्गिभाव ( एकका दूसरेके अन्तर्गत होना ) ही हो सकता है । १. [ क्योंकि ब्रह्मविद्या स्वतन्त्र पुरुषार्थरूप है ] इसीलिये उसमें अग्नि- इन्धन आदि [ आश्रमविहित कर्मों ] की अपेक्षा नहीं है । २. विद्या अपनी उत्पत्तिमें योग्यतावश सभी आश्रम-कर्मोंकी अपेक्षा रखती है। जैसे योग्यतानुसार अश्वका उपयोग होता है। इस विषयमें 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन' इत्यादि श्रुति प्रमाण है, [ अर्थात् जैसे घोड़ा रथमें ही जोता जाता है हलमें नहीं उसी प्रकार ] विद्या अपनी उत्पत्तिमें कर्मोंकी अपेक्षा रखती है;
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
"विविदिषन्ति यज्ञेन" इति | "यज्ञके द्वारा आत्माको जानना श्रुतेरिति विविदिषासाधनत्वेन | चाहते हैं" इस श्रुतिसे वेदने कर्मणामुपयोगं दर्शितवान् । तथा | जिज्ञासाके साधनरूपसे कर्मोंका च "नाविशेषात्" (ब्र० सू० ३। | उपयोग दिखलाया है। तथा इसके आगे ४।१३) "स्तुतयेऽनुमतिर्वा" | "नाविशेषात्" और "स्तुतयेऽनु- (ब्र० सू० ३।४।१४) इति- | मतिर्वा" इन दो सूत्रोंद्वारा "कुर्वन्नेवेह सूत्रद्वयेन कुर्वन्नेवेतिमन्त्रस्यावि- | कर्माणि" इस श्रुतिके दो प्रकारसे द्वद्विषयत्वेन विद्यास्तुतित्वेन | अर्थ दिखलाये हैं—पहला यह कि चार्थद्वयं दर्शितवान् । अत उक्तेन | 'यह 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि मन्त्र अज्ञानी- प्रकारेण ज्ञानस्यैव मोक्षसाधन- | के लिये है।' तथा दूसरा अर्थ यह है त्वायुुक्तः परोपनिषदारम्भः । | कि यह मन्त्र विद्या (ज्ञान) की स्तुतिके लिये है। इसलिये उक्त प्रकारे ज्ञान ही मोक्षका साधन होनेके कारण आगेकी उपनिषद्को आरम्भ करना उचित ही है। ननु बन्धस्य मिथ्यात्वे सति | पूर्व०—यदि जीवका बन्धन ज्ञानादमृत- ज्ञाननिवर्त्यत्वेन | मिथ्या होता तो वह ज्ञानसे निवृत्त त्वेऽनुपपत्ति- | होनेयोग्य हो सकता था और दर्शनम् ज्ञानादमृतत्वं | ऐसी अवस्था में ज्ञानसे अमृतत्वकी स्यात् । न त्वेतदस्ति; प्रति- | प्राप्ति हो सकती थी; किन्तु ऐसी पन्नत्वाद्वाधाभावाद्युष्मदादिस्वरू- | बात है नहीं; क्योंकि बन्धन प्रत्यक्षसिद्ध है, इसका बाध नहीं होता और युष्मदस्मदादि (तू-मैं आदि) रूपसे प्रतीत
मोक्षरूप फलकी सिद्धिमें नहीं। १. [ 'विद्वान्' ऐसा ] विशेषण न होनेके कारण 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि वाक्य तत्त्वज्ञविषयक नहीं है। २. अथवा तत्त्वज्ञके लिये जो कर्मानुज्ञा है वह ज्ञानकी स्तुतिके लिये है। अर्थात् तत्त्वज्ञ होनेपर जीवनपर्यन्त कर्म करनेपर भी कर्मका लेप नहीं होता—ऐसा कहकर तत्त्वज्ञानकी स्तुति की गयी है।
३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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[वाम स्तम्भ / Left Column - संस्कृत]
पत्वेनात्मनो विलक्षणत्वे सादृ- श्याद्यभावादध्यासासम्भवाच्च । उच्यते—न तावत्प्रतिपन्नत्वेन (उक्तस्यानुपपत्तिपरिहारः) सत्यत्वं वक्तुं शक्यते, प्रतिपत्तेः सत्यत्व- मिथ्यात्वयोः समानत्वात् । नापि बाधाभावात्सत्यत्वम्, विधिमुखेन कारणमुखेन च बाधसम्भवात् । तथाहि श्रुतिः— प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं मायाकार- णत्वं च दर्शयति “न तु तद्- द्वितीयमस्ति” ( बृ० उ० ४ । ३ । २३ ) । “एकत्वम्” “नास्ति द्वैतम् ।” “कुतो विदिते वेद्यं नास्ति” । “एकमेवाद्वितीयम्” ( छा० उ० ६ । २ । १ ) “वा- चारम्भणं विकारो नामधेयम्” ( छा० उ० ६ । १ । ४ ) । “एकमेव सत् ।” नेह नानास्ति किञ्चन” ( बृ० उ० ४ । ४ । १९ ) । “एक- धैवानुद्रष्टव्यम्” ( बृ० उ० ४ । ४ । २० ) । “मायां तु प्रकृतिं विद्यात्” ( श्वेता० उ० ४ । १०) “मायी सृजते विश्व- मेतत्” । (श्वेता० उ० ४।९) “इन्द्रो
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column - हिन्दी व्याख्या]
होनेके कारण आत्माका स्वरूप सबसे विलक्षण है, अतः उससे किसीका सादृश्य न होनेके कारण उसमें किसी अन्य वस्तुका अध्यास होना भी सम्भव नहीं है । सिद्धान्ती-अच्छा, बतलाते हैं [ सुनो—] प्रत्यक्षसिद्ध होनेके कारण ही बन्धनकी सत्यता नहीं बतलायी जा सकती, क्योंकि प्रत्यक्षता तो सत्य और असत्य दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंमें समान- रूपसे देखी जाती है । बाध न होनेके कारण भी इसकी सत्यता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि शास्त्रविधि और कारणदृष्टिसे इसका बाध होना सम्भव है ही । जैसे कि “उसके सिवा दूसरा कोई नहीं है,” “एकत्व ही है,” “द्वैत नहीं है,” “क्योंकि ज्ञान हो जानेपर वेद्यका अभाव हो जाता है,” “एक ही अद्वितीय है,” “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है,” “एक ही सद्बस्तु है,” “यहाँ .नाना कुछ भी नहीं है,” “सबको एकरूप ही देखना चाहिये,” “प्रकृतिको माया समझो,” “मायावी परमात्मा इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको रचता है,” “इन्द्र ( परमात्मा ) मायासे
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
मायाभिः पुरुरूप ईयते" ( बृ० | अनेक रूप होकर चेष्टा करता है" उ० २।५।१९) इत्यादिभि- | इत्यादि वाक्योंद्वारा श्रुति प्रपञ्चका वाक्यैः । | मिथ्यात्व और मायामूलकत्व प्रदर्शित "अजोऽपि सन्नव्ययात्मा | करती है । [ श्रीमद्भगवद्गीतामें भूतानामीश्वरोऽपि सन् । | भगवान् भी कहते हैं— ] "मैं प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय | अजन्मा, अविनाशी और सम्पूर्ण संभवाम्यात्ममायया ॥" | प्राणियोंका प्रभु हूँ, तथापि अपनी ( गीता ४ । ६) | प्रकृतिका आश्रय लेकर अपनी "अविभक्तं च भूतेषु | मायासे ही जन्म लेता हूँ", "वह विभक्तमिव च स्थितम्।" | ज्ञेय प्रत्येक शरीरमें आकाशके (गीता १३। १६) | समान अविभक्त एवं एक है तो भी | समस्त प्राणियोंमें विभक्त हुआ-सा | स्थित है।" तथा च ब्राह्मे पुराणे— | ब्रह्मपुराणमें भी कहा है—"धर्म- "धर्माधर्मौ जन्ममृत्यू | अधर्म, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःखकी सुखदुःखेषु कल्पना । | कल्पना, वर्णाश्रमविभाग तथा स्वर्ग वर्णाश्रमास्तथा वासः | या नरकमें रहना ये सब परमार्थ- स्वर्गो नरक एव च ॥ | स्वरूप पुरुषमें कहीं भी नहीं हैं । पुरुषस्य न सन्त्येते | जिस प्रकार मरुमरीचिकारूप मृग- परमार्थस्य कुत्रचित् । | तृष्णा जलवत् प्रतीत होती है, उसी दृश्यते च जगद्रूप- | प्रकार इस जगत्का असत्य स्वरूप मसत्यं सत्यवन्मृषा ॥ | ही व्यर्थ सत्य-सा दृष्टिगोचर हो रहा तोयवन्मृगतृष्णा तु | है। वास्तविक शुक्ति शुक्तिरूप ही है, यथा मरुमरीचिका । | किन्तु जैसे वह चाँदीके समान रौप्यवत्कीकसं भूतं | भासने लगती है, घरमें पड़ा हुआ कीकसं शुक्तिरेव च ॥ | रस्सीका टुकड़ा जैसे रात्रिके समय सर्पवद्रज्जुरखण्डश्च | सर्पवत् दिखायी देने लगता है, निशायां वेश्ममध्यगः । |
३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ एक एवेन्दुद्वौं व्योम्नि | जिसके नेत्र तिमिररोगसे पीडित तिमिराहतचक्षुषः ॥ | हैं उस पुरुषको जैसे आकाशमें एक आकाशस्य घनीभावो | ही चन्द्रमा दो-सा दिखायी देने नीलत्वं स्निग्धता तथा । | लगता है और जिस प्रकार [ सर्वथा एकश्च सूर्यो बहुधा | शून्यस्वरूप ] आकाशमें घनीभाव, जलाधारेषु दृश्यते ॥ | नीलता और स्निग्धताकी प्रतीति आभाति परमात्मापि | होती है [ उसी प्रकार जगत्का रूप सर्वोपाधिषु संस्थितः । | मिथ्या होनेपर भी सत्य-सा जान द्वैतभ्रान्तिरविद्याख्या | पड़ता है ] । जैसे एक ही सूर्य जलके विकल्पो न च तत्तथा ॥ | अनेक आधारोंमें अनेक-सा दिखायी परत्र बन्धागारः स्या- | देता है उसी प्रकार समस्त उपाधियोंमें त्तेषामात्माभिमानिनाम् । | स्थित परमात्मा ही [ उन-उन आत्मभावनया भ्रान्त्या | रूपोंमें ] भास रहा है । यह देहं भावयतां सदा ॥ | अविद्यासंज्ञक द्वैतभ्रान्ति विकल्प ही आप्रज्ञमादिमध्यान्तै- | है, यह यथार्थ नहीं है । र्भ्रमभूतैस्त्रिभिः सदा । | "जो लोग भ्रान्तिवश सर्वदा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तैस्तु | देहको ही आत्मा समझते हैं उन च्छादितं विश्वतैजसम् ॥ | देहाभिमानियोंका वह देह मरनेके स्वमायया स्वमात्मानं - | पश्चात् परलोकमें बन्धनका स्थान | होता है, [ अर्थात् उन्हें पुनः देह | धारण करना पड़ता है] । आदि, मध्य | और अन्तमें जो सर्वदा भ्रमरूप ही | हैं उन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति | तीन अवस्थाओंसे ही विश्व, तैजस | और प्राज्ञ भी आच्छादित हैं । यह | जीव अपनी द्वैतरूप मायासे स्वयं ही
१. जिससे केवल शब्दका ही ज्ञान हो, किसी वस्तुका नहीं, उसे विकल्प कहते हैं; जैसे-आकाशकुसुम, शशशृङ्ग, वन्ध्यापुत्र आदि । इसी आशयका यह योगसूत्र है—'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः' ( १ । ९ ) ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
मोहयेद्द्वैतरूपया । | अपनेको मोहग्रस्त करता है और गुहागतं स्वमात्मानं | स्वयं ही अपने अन्तःकरणमें स्थित लभते च स्वयं हरिम् ॥ | अपने आत्मभूत श्रीहरिको प्राप्त व्योम्नि वज्रानलज्वाला- | करता है । जिस प्रकार आकाशमें कलापो विविधाकृतिः । | वज्राग्नि(बिजली)की अनेक प्रकारकी आभाति विष्णोः सृष्टिश्च | लपटें दिखायी देती हैं उसी प्रकार स्वभावो द्वैतविस्तरः ॥ | भगवान् विष्णुका स्वभाव ही शान्ते मनसि शान्तश्च | द्वैतविस्ताररूप सृष्टि होकर भास घोरे मूढे च तादृशः । | रहा है । सर्वत्र सर्वदा एकमात्र ईश्वरो दृश्यते नित्यं | भगवान् ही शान्त ( सात्त्विक ) सर्वत्र न तु तत्त्वतः ॥ | चित्तमें शान्तरूपसे और घोर (राजस) | तथा मूढ ( तामस ) चित्तमें घोर लोहमृत्पिण्डहेम्नां च | और मूढरूपसे दिखायी दे रहे हैं । विकारो न च विद्यते । | किन्तु तत्त्वतः वे वैसे नहीं हैं । चराचराणां भूतानां | द्वैतता न च सत्यतः ॥ | “लोहा, मृत्पिण्ड और सुवर्ण सर्वगे तु निराधारे | इनका भी विकार नहीं होता । चैतन्यात्मनि संस्थिता । | जितने चराचर भूत हैं उनका भेद अविद्या द्विगुणां सृष्टिं | वस्तुतः नहीं है । सर्वगत निराधार करोत्यात्मावलम्बनात् ॥ | चैतन्यात्मामें स्थित अविद्या ही सर्पस्य रज्जुता नास्ति | आत्माके आश्रयसे स्थूल-सूक्ष्म दोनों नास्ति रज्जौ भुजङ्गता । | प्रकारकी सृष्टि रचती है। जिस प्रकार उत्पत्तिनाशयोर्नास्ति | सर्पमें रज्जुत्व और रज्जुमें सर्पत्व कारणं जगतोऽपि च ॥ | नहीं है उसी प्रकार जगत्के उत्पत्ति लोकानां व्यवहारार्थ- | और नाशका भी कोई कारण नहीं मविद्येयं विनिर्मिता । | है। इस अविद्याकी रचना (कल्पना) | लोकव्यवहारके लिये ही हुई है।
३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
एषा विमोहिनीत्युक्ता द्वैताद्वैतस्वरूपिणी ॥ अद्वैतं भावयेद्ब्रह्म सकलं निष्कलं सदा। आत्मज्ञः शोकसंततीर्णो न बिभेति कुतश्चन ॥ मृत्योः सकाशान्मरणा- दथवान्यकृताद्भयात् । न जायते न म्रियते न वध्यो न च घातकः ॥ न बद्धो बन्धकारी वा न मुक्तो न च मोक्षदः । पुरुषः परमात्मा तु यदतोऽन्यदसच्च तत् ॥ एवं बुद्ध्वा जगद्रूपं विष्णोर्मायामयं मृषा । भोगासङ्गाद्भवन्मुक्त- स्त्यक्त्वा सर्वविकल्पनाम् ॥ त्यक्तसर्वविकल्पश्च स्वात्मस्थं निश्चलं मनः । कृत्वा शान्तो भवेद्योगी दग्धेन्धन इवानलः॥ एषा चतुर्विंशतिभेदभिन्ना
यह द्वैताद्वैतस्वरूपिणी है और [ संसारको मोहित करनेवाली होनेसे ] 'विमोहिनी' कही गयी है। आत्मज्ञानीको चाहिये कि वह सर्वदा पूर्ण परब्रह्मका निष्कल और अद्वैतरूपसे चिन्तन करे। इससे वह शोकसे पार होकर किसीसे भय नहीं करता। उसे मृत्युकी सन्निधिसे, मरनेसे अथवा किसी अन्य कारणसे होनेवाले भयसे भी डर नहीं लगता। "परमपुरुष परमात्मा न जन्म लेता है, न मरता है, न मारा जा सकता है, न मारनेवाला है, न बद्ध है, न बन्धनमें डालनेवाला है, न मुक्त है और न मुक्ति देनेवाला है। उससे भिन्न जो कुछ है वह असत् है। इस प्रकार भगवान् विष्णुके विश्वरूपको मायामय और मिथ्या समझकर सब प्रकारकी कल्पनाको त्यागकर भोगोंकी आसक्तिसे मुक्त हो जाय। इस प्रकार समस्त विकल्पोंसे छूटकर मनको आत्मस्थ, निश्चल और शान्त करके योगी जिसका ईंधन जल चुका है ऐसे [ धूमरहित ] अग्निके समान हो जाता है। "यह चौबीस भेदोंवाली मायो॑
१. मायाके चौबीस भेद इस प्रकार हैं—एक प्रकृति (त्रिगुणात्मिका मूल प्रकृति), सात प्रकृति-विकृति (महत्तत्त्व, अहंकार और पाँच तन्मात्राएँ) और सोलह विकृति (दश इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत)।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५ माया परा प्रकृतिस्तत्तत्समुत्थौ । │ जगत्की मूल कारण है। उसीसे कामक्रोधौ लोभमोहौ भयं च │ काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, विषाद, विषादशोकौ च विकल्पजालम्॥ │ शोक तथा अन्य विकल्पजाल उत्पन्न हुए धर्माधर्मौ सुखदुःखे च सृष्टि- │ हैं। और उसीसे धर्म-अधर्म, सुख-दुःख र्विनाशपाकौ नरके गतिश्च। │ और सृष्टि-विनाशरूप परिणाम, नरकमें वासः स्वर्गे जातयश्चाश्रमाश्च │ जाना, स्वर्गमें रहना, जाति, आश्रम, रागद्वेषौ विविधा व्याधयश्च॥ │ राग, द्वेष, तरह-तरहकी व्याधियाँ, कौमारतारुण्यजरावियोग- │ कुमारावस्था, तरुणता, वृद्धावस्था, संयोगभोगानशनव्रतानि । │ वियोग, संयोग, भोग, उपवास और इतीदमीदृग्विद्यं निधाय │ व्रत प्रकट हुए हैं। इन सबको तूष्णीमासीनः सुमतिं विविद्धि॥” │ इस प्रकार [ प्रकृतिका ही विकार ] │ जाननेवाला पुरुष इन्हें प्रकृतिमें │ स्थापित कर मौनभावसे स्थित रहता │ है। उसे ही तुम शुभ मतिवाला │ जानो।” तथा च श्रीविष्णुधर्मे षड- │ तथा श्रीविष्णुधर्मोत्तरपुराणके ध्यायाम्— │ अन्तर्गत षडध्यायीमें भी कहा “अनादिसम्बन्धवत्या │ है—“यह क्षेत्रज्ञ अपनेमें क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया । │ अनादिकालसे सम्बद्ध हुई अविद्यासे युक्तः पश्यति भेदेन │ युक्त होकर अपने अन्तःकरणमें स्थित ब्रह्म तत्त्वात्मनि स्थितम्॥ │ ब्रह्मको भेदरूपसे देखता है। जबतक पश्यत्यात्मानमन्यञ्च │ जीव परमात्मासे भिन्न अपनेको तथा यावद्वै परमात्मनः। │ अन्य जीवोंको देखता है तबतक वह तावत्संस्राम्यते जन्तु- │ अपने कर्मोंद्वारा मोहित होकर संसारमें र्मोहितो निजकर्मणा ॥ │ भटकाया जाता है। जब इसके सम्पूर्ण संक्षीणाशेषकर्मा तु │ कर्म क्षीण हो जाते हैं तो यह शुद्ध परं ब्रह्म प्रपश्यति । │ परब्रह्मको अपनेसे अभिन्नरूपसे
३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् '[ अध्याय १
३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् '[ अध्याय १ अभेदेनात्मनः शुद्धं | देखता है, और शुद्ध हो जानेके शुद्धत्वादक्षयो भवेत् ॥ | कारण यह अक्षय हो जाता है । अविद्या च क्रियाः सर्वा | समस्त कर्म अविद्यारूप हैं और ज्ञान विद्या ज्ञानं प्रचक्षते । | विद्या कहलाता है । कर्मसे जीवको कर्मणा जायते जन्तु- | जन्म लेना पड़ता है और ज्ञानसे वह र्विद्यया च विमुच्यते ॥ | मुक्त हो जाता है । अद्वैत ही परमार्थ अद्वैतं परमार्थो हि | है और द्वैत उससे भिन्न (अपरमार्थ) द्वैतं तद्भिन्न उच्यते । | कहा जाता है । हे राजन् ! पशु, पशुतिर्यङ्मनुष्याख्यं | तिर्यक्, मनुष्य और नारकी जीव— तथैव नृप नारकम् ॥ | यह चार प्रकारका भेद मिथ्या ज्ञानके चतुर्विधोऽपि भेदोऽयं | ही कारण है । मैं अन्य हूँ, यह अन्य मिथ्याज्ञाननिबन्धनः । | है और ये सब अन्य हैं—यही द्वैत अहमन्योऽपरश्चाय- | कहलानेवाला अज्ञान है । अब ममी चात्र तथापरे ॥ | अद्वैतके विषयमें श्रवण करो । अज्ञानमेतद्द्वैताख्य- | "अद्वैततत्त्व मैं-मेरा, तू-तेरा आदि मद्वैतं श्रूयतां परम् । | बुद्धिसे रहित, निर्विकल्प, निर्विकार मम त्वहमिति प्रज्ञा- | और अनिर्वचनीयरूपसे अनुभूत वियुक्तमविकल्पवत् ॥ | होता है । द्वैत मनोवृत्तिरूप है, अविकार्यमनाख्येय- | परमार्थतः अद्वैत ही तो है; अतः मद्वैतमनुभूयते । | धर्माधर्मरूप निमित्तके कारण उत्पन्न मनोवृत्तिमयं द्वैत- | हुई मनकी वृत्तियोंका निरोध करना मद्वैतं परमार्थतः ॥ | चाहिये । उनका निरोध हो जानेपर मनसो वृत्तयस्तस्मा- | द्वैतकी सिद्धि नहीं होती । द्धर्माधर्मनिमित्तजाः । | यह जो कुछ चराचर जगत् निरोद्धव्यास्तन्निरोधे | है सब मनका दृश्यमात्र है । द्वैतं नैवोपपद्यते ॥ | मनोदृष्टमिदं सर्वं | यत्किञ्चित्सचराचरम् । |
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७ मनसो ह्यमनीभावे- मनका अमनीभाव ( नाश ) हो ऽद्वैतभावं तदाप्नुयात् ॥ जानेपर यह अद्वैतभावको प्राप्त हो कर्मणां भावना येयं जाता है । यह जो कर्मोंकी भावना है सा ब्रह्मपरिपन्थिनी । वह ब्रह्मानुभवमें विघ्नरूप है, क्योंकि कर्मभावनया तुल्यं कर्मोंकी भावनाके अनुकूल ही विज्ञानमुपजायते ॥ विज्ञान प्राप्त होता है । विज्ञान तो तादृग्भवति विज्ञप्ति- वैसा ही होता है जैसी कि भावना र्यादृशी खलु भावना । होती है । अतः भावनाका नाश क्षये तस्याः परं ब्रह्म हो जानेपर परब्रह्मका स्वयं ही स्वयमेव प्रकाशते ॥ अनुभव होने लगता है । हे राजन् ! परात्मनोर्मनुष्येन्द्र आत्मा और परब्रह्मका जो विभाग है विभागोऽज्ञानकल्पितः । वह अज्ञानकल्पित ही है । इसीसे क्षये तस्यात्मपरयो- उसका क्षय हो जानेपर फिर आत्मा रविभागोऽत एव हि ॥ और परब्रह्मका अभेद ही निश्चित आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञो हि होता है । क्षेत्रज्ञसंज्ञक आत्मा प्रकृतिके संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । गुणोंसे युक्त है, वही उनसे रहित तैरेव विगतः शुद्धः होकर शुद्ध होनेपर परमात्मा परमात्मा निगद्यते ॥” कहलाता है ।” तथा च श्रीविष्णुपुराणे— ऐसा ही श्रीविष्णुपुराणमें भी कहा “परमात्मा त्वमेवैको है—“हे जगत्पते ! तुम्हीं एकमात्र नान्योऽस्ति जगतः पते । परमात्मा हो; तुमसे भिन्न और कुछ भी तवैष महिमा येन नहीं है । जिससे यह चराचर जगत् व्याप्तमेतच्चराचरम् ॥ व्याप्त है वह यह तुम्हारी ही यदेतद्दृश्यते मूर्त्त- महिमा है । यह जो कुछ मूर्त्त जगत् मेतज्ज्ञानात्मनस्तव । दिखायी देता है ज्ञानस्वरूप आपका ही भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति रूप है । असंयमी लोग अपने भ्रमपूर्ण जगद्रूपमयोगिनः ॥ ज्ञानके अनुसार इसे जगद्रूप देखते हैं।