भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ च्चयोऽङ्गाङ्गिभावो वा नास्तीति प्रतिपाद्य “अत एव चाग्नीन्धना- द्यनपेक्षा” ( ब्र० सू० ३।४। २५) इति विद्याया एव परम- पुरुषार्थहेतुत्वादग्नीन्धनाद्याश्रम- कर्माणि विद्यायाः स्वार्थसिद्धौ नापेक्षितव्यानीति पूर्वोक्तस्याधि- करणस्य फलमुपसंहृत्यात्यन्तमे- वानपेक्षायां प्राप्तायां “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” ( ब्र० सू० ३।४। २६ ) इति नात्य- न्तमनपेक्षा । उत्पन्ना हि विद्या फलसिद्धिं प्रति न किञ्चिदन्यद्- पेक्षते । उत्पत्तिं प्रत्यपेक्षत एव । समुच्चय अथवा अङ्गाङ्गिभाव कुछ भी नहीं हो सकता *-ऐसा प्रतिपादन करके “अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा” इस सूत्रसे 'विद्या ही परमपुरुषार्थकी हेतु होनेके कारण वह अपने प्रयोजनकी पूर्तिमें अग्नि-इन्धनादिसे निष्पन्न होने- वाले आश्रम-कर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखती' इस प्रकार पूर्वोक्त अधिकरणके फलका उपसंहार कर ज्ञानप्राप्तिमें कर्मकी अत्यन्त अनपेक्षा प्राप्त होनेपर “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” इस सूत्रसे यह बतलाया है कि कर्मकी बिल्कुल ही अपेक्षा न हो- ऐसी बात नहीं है, अपि तु विद्या उत्पन्न हो जानेपर ही अपने फलकी सिद्धिमें किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं रखती, अपनी उत्पत्तिमें तो उसे कर्मकी अपेक्षा है ही, क्योंकि

  • वेदमें कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड ये दोनों अलग-अलग हैं तथा ज्ञानसे मोक्ष और कर्मोंसे स्वर्गादिकी प्राप्ति होती है; इसलिये इनके फल भी अलग-अलग हैं । अतः इन दोनोंका परस्पर न तो विकल्प ( एक ही प्रयोजनके लिये दोनोंमेंसे किसी एकका अनुष्ठान ), न समुच्चय ( दोनोंका एक साथ अनुष्ठान ) और न अङ्गाङ्गिभाव ( एकका दूसरेके अन्तर्गत होना ) ही हो सकता है । १. [ क्योंकि ब्रह्मविद्या स्वतन्त्र पुरुषार्थरूप है ] इसीलिये उसमें अग्नि- इन्धन आदि [ आश्रमविहित कर्मों ] की अपेक्षा नहीं है । २. विद्या अपनी उत्पत्तिमें योग्यतावश सभी आश्रम-कर्मोंकी अपेक्षा रखती है। जैसे योग्यतानुसार अश्वका उपयोग होता है। इस विषयमें 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन' इत्यादि श्रुति प्रमाण है, [ अर्थात् जैसे घोड़ा रथमें ही जोता जाता है हलमें नहीं उसी प्रकार ] विद्या अपनी उत्पत्तिमें कर्मोंकी अपेक्षा रखती है;