श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 43, कुल 276 में से
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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
"विविदिषन्ति यज्ञेन" इति | "यज्ञके द्वारा आत्माको जानना श्रुतेरिति विविदिषासाधनत्वेन | चाहते हैं" इस श्रुतिसे वेदने कर्मणामुपयोगं दर्शितवान् । तथा | जिज्ञासाके साधनरूपसे कर्मोंका च "नाविशेषात्" (ब्र० सू० ३। | उपयोग दिखलाया है। तथा इसके आगे ४।१३) "स्तुतयेऽनुमतिर्वा" | "नाविशेषात्" और "स्तुतयेऽनु- (ब्र० सू० ३।४।१४) इति- | मतिर्वा" इन दो सूत्रोंद्वारा "कुर्वन्नेवेह सूत्रद्वयेन कुर्वन्नेवेतिमन्त्रस्यावि- | कर्माणि" इस श्रुतिके दो प्रकारसे द्वद्विषयत्वेन विद्यास्तुतित्वेन | अर्थ दिखलाये हैं—पहला यह कि चार्थद्वयं दर्शितवान् । अत उक्तेन | 'यह 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि मन्त्र अज्ञानी- प्रकारेण ज्ञानस्यैव मोक्षसाधन- | के लिये है।' तथा दूसरा अर्थ यह है त्वायुुक्तः परोपनिषदारम्भः । | कि यह मन्त्र विद्या (ज्ञान) की स्तुतिके लिये है। इसलिये उक्त प्रकारे ज्ञान ही मोक्षका साधन होनेके कारण आगेकी उपनिषद्को आरम्भ करना उचित ही है। ननु बन्धस्य मिथ्यात्वे सति | पूर्व०—यदि जीवका बन्धन ज्ञानादमृत- ज्ञाननिवर्त्यत्वेन | मिथ्या होता तो वह ज्ञानसे निवृत्त त्वेऽनुपपत्ति- | होनेयोग्य हो सकता था और दर्शनम् ज्ञानादमृतत्वं | ऐसी अवस्था में ज्ञानसे अमृतत्वकी स्यात् । न त्वेतदस्ति; प्रति- | प्राप्ति हो सकती थी; किन्तु ऐसी पन्नत्वाद्वाधाभावाद्युष्मदादिस्वरू- | बात है नहीं; क्योंकि बन्धन प्रत्यक्षसिद्ध है, इसका बाध नहीं होता और युष्मदस्मदादि (तू-मैं आदि) रूपसे प्रतीत
मोक्षरूप फलकी सिद्धिमें नहीं। १. [ 'विद्वान्' ऐसा ] विशेषण न होनेके कारण 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि वाक्य तत्त्वज्ञविषयक नहीं है। २. अथवा तत्त्वज्ञके लिये जो कर्मानुज्ञा है वह ज्ञानकी स्तुतिके लिये है। अर्थात् तत्त्वज्ञ होनेपर जीवनपर्यन्त कर्म करनेपर भी कर्मका लेप नहीं होता—ऐसा कहकर तत्त्वज्ञानकी स्तुति की गयी है।