भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 276 में से

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[शीर्षक / Header] ३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १


[वाम स्तम्भ / Left Column - संस्कृत]

पत्वेनात्मनो विलक्षणत्वे सादृ- श्याद्यभावादध्यासासम्भवाच्च । उच्यते—न तावत्प्रतिपन्नत्वेन (उक्तस्यानुपपत्तिपरिहारः) सत्यत्वं वक्तुं शक्यते, प्रतिपत्तेः सत्यत्व- मिथ्यात्वयोः समानत्वात् । नापि बाधाभावात्सत्यत्वम्, विधिमुखेन कारणमुखेन च बाधसम्भवात् । तथाहि श्रुतिः— प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं मायाकार- णत्वं च दर्शयति “न तु तद्- द्वितीयमस्ति” ( बृ० उ० ४ । ३ । २३ ) । “एकत्वम्” “नास्ति द्वैतम् ।” “कुतो विदिते वेद्यं नास्ति” । “एकमेवाद्वितीयम्” ( छा० उ० ६ । २ । १ ) “वा- चारम्भणं विकारो नामधेयम्” ( छा० उ० ६ । १ । ४ ) । “एकमेव सत् ।” नेह नानास्ति किञ्चन” ( बृ० उ० ४ । ४ । १९ ) । “एक- धैवानुद्रष्टव्यम्” ( बृ० उ० ४ । ४ । २० ) । “मायां तु प्रकृतिं विद्यात्” ( श्वेता० उ० ४ । १०) “मायी सृजते विश्व- मेतत्” । (श्वेता० उ० ४।९) “इन्द्रो


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column - हिन्दी व्याख्या]

होनेके कारण आत्माका स्वरूप सबसे विलक्षण है, अतः उससे किसीका सादृश्य न होनेके कारण उसमें किसी अन्य वस्तुका अध्यास होना भी सम्भव नहीं है । सिद्धान्ती-अच्छा, बतलाते हैं [ सुनो—] प्रत्यक्षसिद्ध होनेके कारण ही बन्धनकी सत्यता नहीं बतलायी जा सकती, क्योंकि प्रत्यक्षता तो सत्य और असत्य दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंमें समान- रूपसे देखी जाती है । बाध न होनेके कारण भी इसकी सत्यता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि शास्त्रविधि और कारणदृष्टिसे इसका बाध होना सम्भव है ही । जैसे कि “उसके सिवा दूसरा कोई नहीं है,” “एकत्व ही है,” “द्वैत नहीं है,” “क्योंकि ज्ञान हो जानेपर वेद्यका अभाव हो जाता है,” “एक ही अद्वितीय है,” “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है,” “एक ही सद्बस्तु है,” “यहाँ .नाना कुछ भी नहीं है,” “सबको एकरूप ही देखना चाहिये,” “प्रकृतिको माया समझो,” “मायावी परमात्मा इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको रचता है,” “इन्द्र ( परमात्मा ) मायासे