भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

मायाभिः पुरुरूप ईयते" ( बृ० | अनेक रूप होकर चेष्टा करता है" उ० २।५।१९) इत्यादिभि- | इत्यादि वाक्योंद्वारा श्रुति प्रपञ्चका वाक्यैः । | मिथ्यात्व और मायामूलकत्व प्रदर्शित "अजोऽपि सन्नव्ययात्मा | करती है । [ श्रीमद्भगवद्गीतामें भूतानामीश्वरोऽपि सन् । | भगवान् भी कहते हैं— ] "मैं प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय | अजन्मा, अविनाशी और सम्पूर्ण संभवाम्यात्ममायया ॥" | प्राणियोंका प्रभु हूँ, तथापि अपनी ( गीता ४ । ६) | प्रकृतिका आश्रय लेकर अपनी "अविभक्तं च भूतेषु | मायासे ही जन्म लेता हूँ", "वह विभक्तमिव च स्थितम्।" | ज्ञेय प्रत्येक शरीरमें आकाशके (गीता १३। १६) | समान अविभक्त एवं एक है तो भी | समस्त प्राणियोंमें विभक्त हुआ-सा | स्थित है।" तथा च ब्राह्मे पुराणे— | ब्रह्मपुराणमें भी कहा है—"धर्म- "धर्माधर्मौ जन्ममृत्यू | अधर्म, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःखकी सुखदुःखेषु कल्पना । | कल्पना, वर्णाश्रमविभाग तथा स्वर्ग वर्णाश्रमास्तथा वासः | या नरकमें रहना ये सब परमार्थ- स्वर्गो नरक एव च ॥ | स्वरूप पुरुषमें कहीं भी नहीं हैं । पुरुषस्य न सन्त्येते | जिस प्रकार मरुमरीचिकारूप मृग- परमार्थस्य कुत्रचित् । | तृष्णा जलवत् प्रतीत होती है, उसी दृश्यते च जगद्रूप- | प्रकार इस जगत्का असत्य स्वरूप मसत्यं सत्यवन्मृषा ॥ | ही व्यर्थ सत्य-सा दृष्टिगोचर हो रहा तोयवन्मृगतृष्णा तु | है। वास्तविक शुक्ति शुक्तिरूप ही है, यथा मरुमरीचिका । | किन्तु जैसे वह चाँदीके समान रौप्यवत्कीकसं भूतं | भासने लगती है, घरमें पड़ा हुआ कीकसं शुक्तिरेव च ॥ | रस्सीका टुकड़ा जैसे रात्रिके समय सर्पवद्रज्जुरखण्डश्च | सर्पवत् दिखायी देने लगता है, निशायां वेश्ममध्यगः । |

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