श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 46, कुल 276 में से
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३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ एक एवेन्दुद्वौं व्योम्नि | जिसके नेत्र तिमिररोगसे पीडित तिमिराहतचक्षुषः ॥ | हैं उस पुरुषको जैसे आकाशमें एक आकाशस्य घनीभावो | ही चन्द्रमा दो-सा दिखायी देने नीलत्वं स्निग्धता तथा । | लगता है और जिस प्रकार [ सर्वथा एकश्च सूर्यो बहुधा | शून्यस्वरूप ] आकाशमें घनीभाव, जलाधारेषु दृश्यते ॥ | नीलता और स्निग्धताकी प्रतीति आभाति परमात्मापि | होती है [ उसी प्रकार जगत्का रूप सर्वोपाधिषु संस्थितः । | मिथ्या होनेपर भी सत्य-सा जान द्वैतभ्रान्तिरविद्याख्या | पड़ता है ] । जैसे एक ही सूर्य जलके विकल्पो न च तत्तथा ॥ | अनेक आधारोंमें अनेक-सा दिखायी परत्र बन्धागारः स्या- | देता है उसी प्रकार समस्त उपाधियोंमें त्तेषामात्माभिमानिनाम् । | स्थित परमात्मा ही [ उन-उन आत्मभावनया भ्रान्त्या | रूपोंमें ] भास रहा है । यह देहं भावयतां सदा ॥ | अविद्यासंज्ञक द्वैतभ्रान्ति विकल्प ही आप्रज्ञमादिमध्यान्तै- | है, यह यथार्थ नहीं है । र्भ्रमभूतैस्त्रिभिः सदा । | "जो लोग भ्रान्तिवश सर्वदा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तैस्तु | देहको ही आत्मा समझते हैं उन च्छादितं विश्वतैजसम् ॥ | देहाभिमानियोंका वह देह मरनेके स्वमायया स्वमात्मानं - | पश्चात् परलोकमें बन्धनका स्थान | होता है, [ अर्थात् उन्हें पुनः देह | धारण करना पड़ता है] । आदि, मध्य | और अन्तमें जो सर्वदा भ्रमरूप ही | हैं उन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति | तीन अवस्थाओंसे ही विश्व, तैजस | और प्राज्ञ भी आच्छादित हैं । यह | जीव अपनी द्वैतरूप मायासे स्वयं ही
१. जिससे केवल शब्दका ही ज्ञान हो, किसी वस्तुका नहीं, उसे विकल्प कहते हैं; जैसे-आकाशकुसुम, शशशृङ्ग, वन्ध्यापुत्र आदि । इसी आशयका यह योगसूत्र है—'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः' ( १ । ९ ) ।