भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

[Page Header] २४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १


[Left Column - संस्कृत पाठ] तोक्तिरप्ययुक्तैवोक्तेति मत्वा चकितः सन्वेदो विदुषस्त्याग- कर्तव्यतामपि नोक्तवान् । कुर्व- न्नेवेह लोके विद्यमानं पुण्य- पापादिकं कर्म यावज्जीवं जिजी- विषेत् । न पुण्यादिबन्धभयात्पु- ण्यादिकं त्यक्त्वा तूष्णीमवतिष्ठेत । एवं तावत्कर्माणि कुर्वत्यपि विदुषि त्वयीतो यावज्जीवानुष्ठाना- दन्यथाभावः स्वरूपात्प्रच्युतिः पुण्यादिनिमित्तसंसारान्वयो ना- स्ति । अथवेतः कर्मानुष्ठानोत्तर- कालभाव्यन्यथाभावः संसारान्वयो नास्ति । यस्मात्त्वयि विन्यस्तं न कर्म लिप्यते । तथा च श्रुत्य- न्तरम्—“न लिप्यते कर्मणा पापकेन” (बृ० उ० ४।४।२३)।

[Right Column - हिन्दी अनुवाद] अनुचित ही है, चकित हुआ; अतः यह दिखानेके लिये कि मैंने विद्वान्के लिये कर्मत्यागकी भी विधि नहीं की है, यह कहा है कि ज्ञानी इस लोकमें आजीवन यथाप्राप्त पुण्य- पापादि रूप कर्म करता हुआ जीनेकी इच्छा करे; उसे पुण्यादि फलके बन्धनके भयसे पुण्यादिको त्यागकर चुपचाप बैठनेकी आवश्य- कता नहीं है । * क्योंकि इस प्रकार यावज्जीवन कर्म करते रहनेपर भी तुझ ब्रह्मवेत्ताका अन्यथाभाव— स्वरूपच्युति अर्थात् पुण्यादिके कारण होनेवाला संसारका संसर्ग नहीं हो सकता । अथवा ‘इतः’ यानी कर्मानुष्ठानके पीछे होनेवाला अन्यथा- भाव—संसारका संसर्ग नहीं हो सकता । क्योंकि तुझ ब्रह्मवेत्तामें स्थापित कर्म लिप्त (संपृक्त) नहीं होता । ऐसी ही अन्य श्रुतियाँ भी हैं—'ज्ञानी पापकर्मोंसे लिप्त नहीं


[Footnote / पादटिप्पणी]

  • ज्ञानीमें कर्तृत्वाभिमान नहीं होता और न उसकी भोगदृष्टि ही होती है। इसलिये किसी भी प्रकारकी वासना न रहनेके कारण वह न तो पुण्यफलकी प्राप्तिके लिये पुण्यकर्मोंमें ही प्रवृत्त होता है और न आसक्तिवश पापकर्म ही करता है। उसके प्रारब्धानुसार उससे जो कर्म होते हैं उनसे अन्य पुरुषोंका जो इष्ट या अनिष्ट होता है उसके कारण वे उनमें पुण्य या पापका आरोप कर लेते हैं। इसलिये उन्हींकी दृष्टिसे यहाँ ज्ञानीके कर्मोंको पुण्य-पाप विशेषणोंसे विशेषित किया है ! यदि अपने द्वारा होते हुए कर्मोंमें ज्ञानीकी पुण्य-पापदृष्टि रहेगी तो यह असम्भव है कि उसे उनका फल न भोगना पड़े । पुण्य-पापदृष्टि तो जीवकी होती है और ज्ञानीमें जीवत्वका अत्यन्ताभाव होता है ।