श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
लोकद्वयेऽपि कर्तव्यं | उसे दोनों लोकोंमें कोई कर्त्तव्य नहीं किञ्चिदस्य न विद्यते । | रहता वह सर्वथा पूर्ण और समदर्शी इहैव स विमुक्तः स्या- | होनेके कारण इस लोकमें ही मुक्त त्सम्पूर्णः समदर्शनः ॥” | हो जाता है ।” तस्माद्विदुषः कर्तव्याभावाद- | अतः विद्वान्के लिये कोई | कर्त्तव्य न होनेके कारण ‘कर्म विद्यावद्विषय एवायं कुर्वन्नेवे- | करता हुआ ही सौ वर्ष जीनेकी | इच्छा करे’ इत्यादि रूपसे कर्म त्यादिकर्मनियमः । कुर्वन्नेवेति | करनेका नियम केवल अज्ञानियोंके | ही लिये है । अथवा यह समझना च नायं कर्मनियमः किन्तु विद्या- | चाहिये कि ‘कुर्वन्नेव’ इत्यादि वाक्य | कर्मका नियामक नहीं है, माहात्म्यं दर्शयितुं यथाकामं | अपि तु ज्ञानकी महिमा दिखानेके | उद्देश्यसे [ज्ञानीके लिये] स्वेच्छानुसार कर्मानुष्ठानमेव द्रष्टव्यम् । एतदुक्तं | कर्मानुष्ठान प्रदर्शित करनेके लिये | ही है । इसके द्वारा यह बतलाया भवति-यावज्जीवं यथाकामं | गया है कि विद्वान् स्वेच्छासे जीवन- | पर्यन्त पुण्य-पापादिरूप कर्म करता पुण्यपापादिकं कुर्वत्यपि विदुषि | भी रहे तो भी ज्ञानके सामर्थ्यसे उसे | उन कर्मोंका लेप नहीं होगा । न कर्मलेपो भवति विद्यासामर्थ्या- | तात्पर्य यह है कि ‘ईशावास्यमिद | सर्वम्’ यहाँसे लेकर ‘तेन त्यक्तेन दिति । तथा हि-“ईशावास्य- | भुञ्जीथाः’ इस प्रथम मन्त्रसे सर्वकर्म- | परित्यागपूर्वक आत्मरक्षाका प्रतिपादन मिद सर्वम्” (ईशा० उ० १) | करनेपर वेद यह देखकर कि जिसके | लिये कोई भी विधि नहीं की जा इत्यारभ्य “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः” | सकती उस ब्रह्मवेत्ताके लिये | सर्वकर्मपरित्यागका विधान करना भी ( ईशा० उ० १) इति विदुषः | सर्वकर्मत्यागेनात्मपालनमुक्त्वा- | नियोज्ये ब्रह्मविदि त्यागकर्तव्य- |