श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ज्ञानाभ्यासरतो नित्यं | परमार्थतत्त्वको जाननेवाला ज्ञाना- विरक्तो ह्यर्थवित्स्वयम् । | भ्यासमें तत्पर विरक्त पुरुष कर्तव्यकी कर्तव्यभावमुत्सृज्य | चिन्ता छोड़कर केवल ज्ञानहीको ज्ञानमेवाधिगच्छति ॥ | प्राप्त करता है। हे द्विजश्रेष्ठ ! जो वर्णाश्रमाभिमानी य- | वर्णाश्रमाभिमानी पुरुष ज्ञानदृष्टिको स्त्यक्त्वा ज्ञानं द्विजोत्तमाः। | त्यागकर मोहवश कहीं अन्यत्र सुख अन्यत्र रमते मूढः | मानता है वह अज्ञानी है, इसमें सोऽज्ञानी नात्र संशयः ॥ | सन्देह नहीं। क्रोध, भय, लोभ, क्रोधो भयं तथा लोभो | मोह, भेददृष्टि, मद, अज्ञान और मोहो भेदो मदस्तमः। | धर्माधर्म—ये सब ऐसे लोगोंको ही धर्माधर्मौ च तेषां हि | प्राप्त होते हैं और इनके अधीन तद्वशाच्च तनुग्रहः॥ | होनेपर देह धारण करना पड़ता शरीरे सति वै क्लेशः | है। तथा शरीरके रहते हुए क्लेश सोऽविद्यां संत्यजेत्ततः। | अवश्यम्भावी है। अतः जीवको अविद्यां विद्यया हित्वा | अविद्याका त्याग करना चाहिये। स्थितस्यैवेह योगिनः॥ | जो योगी विद्याद्वारा अविद्याका त्याग क्रोधाद्या नाशमायान्ति | करके स्थित है उसके क्रोधादि दोष धर्माधर्मौ च नश्यतः। | तथा धर्म और अधर्म इस लोकमें तत्क्षयाच्च शरीरेण | रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं। न पुनः संप्रयुज्यते ॥ | उनका क्षय होनेपर उसका फिर स एव मुक्तः संसारा- | शरीरसे संयोग नहीं होता, तथा दुःखत्रयविवर्जितः।।" | वही त्रिविध तापसे छूटकर संसारसे तथा शिवधर्मोत्तरे— | मुक्त हो जाता है।" "ज्ञानामृतेन तृप्तस्य | तथा शिवधर्मोत्तरमें कहा है— कृतकृत्यस्य योगिनः। | "जो योगी ज्ञानामृतसे तृप्त होकर नैवास्ति किञ्चित्कर्तव्य- | कृतकृत्य हो गया है उसके लिये मस्ति चेन्न स तत्त्ववित् । | कोई कर्तव्य नहीं रहता, और यदि | रहता है तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है।