भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 276 में से

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अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९ शासन करता है; क्योंकि इसका शासन करनेके लिये कोई और समर्थ नहीं है ॥ १७॥ स तन्मय इति । स तन्मयो | ‘स तन्मयो’ इत्यादि । वह विश्वात्मा । अथवा तन्मयो | तन्मय अर्थात् विश्वरूप है । अथवा ज्योतिर्मय इति ‘तस्य भासा | ‘उसके प्रकाशसे वह सब प्रकाशित सर्वमिदं विभाति’ इत्येतदपेक्ष्यो- | है’ इस उक्तिकी अपेक्षासे ‘तन्मय’ च्यते । अमृतोऽमरणधर्मा । ईशे | शब्दसे ज्योतिर्मय भी कहा जा स्वामिनि सम्यक्स्थितिर्यस्यासा- | सकता है । अमृत–अमरणधर्मा, वीशसंस्थः । जानातीति ज्ञः । | ईश यानी ईश्वरभावमें जिसकी सम्यक् सर्वत्र गच्छतीति सर्वगः । | स्थिति है अतः वह ईशसंस्थ है, भुवनस्यास्य गोप्ता पालयिता । | जानता है इसलिये ज्ञ है, सर्वत्र जाता है य ईश ईष्टेऽस्य जगतो नित्य- | इसलिये सर्वग है, इस भुवनका गोप्ता मेव नियमेन नान्यो हेतुः समर्थो | यानी पालनकर्ता है, जो इस जगत्- विद्यत ईशनाय जगदीशनाय | को नित्य–नियमसे शासित करता ॥१७॥ | है, क्योंकि जगत्के शासनके लिये कोई और हेतु–समर्थ नहीं है॥१७॥ मुमुक्षुके लिये भगवच्छरणागतिका उपदेश यस्मात्स एव संसारमोक्ष- | क्योंकि वही संसारके मोक्ष, स्थितिबन्धहेतुस्तस्मात्तमेव मुमुक्षुः | स्थिति और बन्धनका हेतु है इसलिये सर्वात्मना शरणं प्रपद्येत गच्छे- | मुमुक्षु पुरुषको सब प्रकार उसीकी दिति प्रतिपादयितुमाह— | शरणमें जाना चाहिये—यह प्रति- पादन करनेके लिये श्रुति कहती है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ १८॥

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