भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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२३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 स विश्वकृदिति। स विश्वकृद्वि- | 'स विश्वकृत्' इत्यादि । वह श्वस्य कर्ता । विश्वं वेत्तीति विश्व- | विश्वकृत्-विश्वका कर्ता है, विश्वको वित् । आत्मा चासौ योनिश्चेत्यात्म- | जानता है-इसलिये विश्ववेत्ता है, योनिः । जानातीति ज्ञः । सर्व- | आत्मा और योनि है इसलिये आत्म- स्यात्मा सर्वस्य च योनिः सर्वज्ञ- | योनि है, जानता है इसलिये ज्ञ है। श्चैतन्यज्योतिरित्यर्थः । कालकारः | तात्पर्य यह है कि वह सबका आत्मा, कालस्य कर्ता गुण्यपहतपाप्मादि- | सबका योनि (उत्पत्तिस्थान) और मान्विश्वविदित्स्य प्रपञ्चः । | सर्वज्ञ अर्थात् चैतन्यज्योति है । प्रधानमव्यक्तम् । क्षेत्रज्ञो विज्ञा- | तथा कालकार-कालका कर्ता और नात्मा । तयोः पतिः पालयिता । | गुणी--अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् गुणानां सत्त्वरजस्तमसामीशः । | है। यह सब 'विश्ववित्' इस संसारमोक्षस्थितिबन्धानां हेतुः | विशेषणका विस्तार है। [इसके कारणम् ॥१६॥ | सिवा] वही प्रधान-अव्यक्त और | क्षेत्रज्ञ-विज्ञानात्मा, इन दोनोंका | पति-पालन करनेवाला, सत्त्व, रज, | तम इन तीनों गुणोंका नियामक तथा | संसारके मोक्ष, स्थिति और बन्धनका | हेतु यानी कारण है ॥१६॥ किञ्च— | तथा— स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता । य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥१७॥ वह तन्मय (जगद्रूप अथवा ज्योतिर्मय), अमरणधर्मा, ईश्वरलूपसे स्थित, ज्ञाता, सर्वगत और इस भुवनका रक्षक है, जो सर्वदा इस जगत्‌का