श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 5, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ प्रस्तावना 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' कृष्णयजुर्वेदके अन्तर्गत है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। उन्होंने चतुर्थाश्रमियोंको इस विद्याका उपदेश किया था। यह बात इस उपनिषद्के षष्ठ अध्यायके इक्कीसवें मन्त्रसे विदित होती है। इस उपनिषद्की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। इसमें साधन, साध्य, साधक और प्रति- पाद्य विषयके महत्त्वका बहुत स्पष्ट और मार्मिक भाषामें निरूपण किया है। इसमें प्रसंगानुसार सांख्य, योग, सगुण, निर्गुण, द्वैत, अद्वैत आदि कई प्रकारके सिद्धान्तोंका उल्लेख हुआ है। अतः इसके वाक्योंके आधारसे सांख्यवादी और द्वैतमतावलम्बियोंने भी बड़े समारोहसे अपने सिद्धान्तोंका समर्थन किया है। इसका आरम्भ जगत्के कारणकी मीमांसासे होता है । कुछ ब्रह्मवादी आपसमें मिलकर इस विषयमें विचार करते हैं कि जगत्का कारण क्या है ? हम कहाँसे उत्पन्न हुए ? किसके द्वारा हम जीवन धारण करते हैं? कौन हमारा आधार है ? और किसकी प्रेरणासे हम दुःख-सुख भोग करते हैं? संसारके सम्पूर्ण दार्शनिक इन प्रश्नोंको हल करनेमें ही व्यस्त रहे हैं। और उन्होंने अपनी-अपनी अनुभूतिके आधारपर जो-जो निर्णय किये हैं वे ही विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्तोंके रूपमें प्रसिद्ध हुए हैं । वस्तुतः इस प्रकारकी जिज्ञासा ही सारे दर्शनशास्त्रका बीज है और यह जितनी तीव्र एवं निरपेक्ष होती है उतनी ही अधिक वास्तविकताके समीप ले जानेवाली होती है। अस्तु । ऋषियोंने जगत्के कारणकी मीमांसा करते हुए काल-स्वभावादि लोकप्रसिद्ध कारणोंपर विचार किया; किन्तु उनमेंसे कोई भी उनकी जिज्ञासा शान्त करनेमें सफल न हुआ, उन्हें सभी अपूर्ण और अशाश्वत दिखायी दिये। अन्तमें उन्होंने ध्यानयोगके द्वारा यह अनुभव किया कि भगवान्की स्वरूपभूता माया ही जगत्का कारण है। उन्हें इस संसारसरिताका स्पष्ट दर्शन हुआ और उन्होंने देखा