श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४ ) कि जड़-चेतन दोनोंसे परे इनका अधिष्ठाता और प्रेरक जो एक देव है वही अपनी मायाशक्तिसे जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है और उसका साक्षात्कार होनेपर ही जीव मायाके चक्रसे मुक्त हो सकता है। उसे कहीं अन्यत्र ढूँढ़नेकी आवश्यकता नहीं है। वह सर्वदा अपने अन्तःकरणमें ही स्थित है। इस अपने अन्तरात्मासे भिन्न कोई और देव नहीं है तथा यही भोक्ता, भोग्य और प्रेरक भी कहा जाता है। इस प्रकार प्रथम अध्यायमें जगत्कारणका निर्णय कर प्रणवचिन्तन- पूर्वक ध्यानाभ्यासको ही उसके साक्षात्कारका साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण द्वितीय अध्यायमें है। वहाँ ध्यानकी विधि, ध्यानके योग्य स्थान, योगकी प्रथम प्रवृत्ति और उसके फलका बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है। इस तरह साधनका निरूपण कर फिर तृतीय अध्यायमें साध्यका प्रतिपादन किया है। वहाँ उस एक ही तत्त्वका पहले सगुण-साकाररूपसे, फिर अन्तर्यामी और विराट्रूपसे तथा अन्तमें शुद्धरूपसे निरूपण हुआ है। चतुर्थ अध्यायमें तत्त्वबोधकी प्राप्ति और मायासे मुक्त होनेके लिये उस देवकी स्तुति की गयी है तथा अनेक प्रकारसे उसके स्वरूप और महत्त्वका वर्णन किया गया है। पञ्चम अध्यायमें क्षर, अक्षर और इन दोनोंके प्रेरक परमात्माके स्वरूपोंका स्पष्टीकरण हुआ है। वहाँ क्षरका भोग्यत्व, अक्षर (जीव) का भोक्तृत्व और परमात्माका नियन्तृत्व बतलाया गया है तथा यह भी प्रदर्शित किया है कि जीव अपने संकल्पके अनुसार विभिन्न योनियोंको प्राप्त होता है और परमात्माका ज्ञान होनेपर सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। इसके पश्चात् छठे अध्यायमें भी परमात्माके स्वरूप और महत्त्वका ही प्रतिपादन करते हुए अन्तमें उसीके ज्ञानसे सारे दुःखोंकी निवृत्ति बतलायी है और यह कहा है कि उस देवको जाने बिना दुःखोंका अन्त होना इसी प्रकार असम्भव है जैसे व्यापक और निरवयव आकाशको चमड़ेके समान लपेटना। इस प्रकार इस उपनिषद्में आदिसे अन्ततक केवल परमार्थतत्त्व- का ही निरूपण हुआ है। फिर अन्तमें एक मन्त्रद्वारा इस विद्याके