श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ यति—देवात्मशक्तिमिति। देवस्य | 'देवात्मशक्तिम्' इत्यादि वाक्यसे द्योतनादियुक्तस्य मायिनो महे- | दिखाते हैं—उन्होंने देव— श्वरस्य परमात्मन आत्मभूताम- | द्योतनादियुक्त मायावी महेश्वर— स्वतन्त्रां न सांख्यपरिकल्पित- | परमात्माकी स्वरूपभूता—अस्वतन्त्रा प्रधानादिवत्पृथग्भूतां स्वतन्त्रां | शक्तिको कारणरूपसे देखा, शक्तिं कारणमपश्यन् । दर्शयि- | सांख्यमतद्वारा कल्पना किये हुए ष्यति च—"मायां तु प्रकृतिं | प्रधानादिके समान उससे भिन्न किसी विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्” | स्वतन्त्रा शक्तिको नहीं। आगे श्रुति ( श्वेता० उ० ४ । १०) इति । | यह दिखलावेगी भी—"मायाको | प्रकृति जानो और मायावीको | महेश्वर ।" तथा ब्राह्मे—"एषा चतुर्विं- | इसी प्रकार ब्रह्मपुराणमें कहा है— शतिभेदभिन्ना माया परा प्रकृति- | "यह चौबीस प्रकारके भेदोंवाली माया स्तत्समुत्था ।” तथा च—"मया- | परमात्मासे प्रकट हुई उसीकी परा- ध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचरा- | प्रकृति है।" तथा गीतामें कहा चरम् ।” ( गीता ९।१०) इति । | है---"मुझ अधिष्ठानके द्वारा प्रकृति | चराचरको उत्पन्न करती है।" स्वगुणैः प्रकृतिकार्यभूतैः पृथि- | [ कैसी शक्तिको देखा—] जो व्यादिभिश्च निगूढां संवृतां का- | अपने गुणोंसे प्रकृतिके कार्यभूत र्याकारेण कारणाकारस्याभिभूत- | पृथ्वी आदिसे निगूढ—आच्छादित त्वात्कार्यात्पृथक्स्वरूपेणोपलब्धु- | थी । अर्थात् कारणका स्वरूप मयोग्यामित्यर्थः । तथा च प्रकृ- | कार्यके स्वरूपसे दब जानेके कारण, तिकार्यत्वं गुणानां दर्शयति | जो कार्यसे पृथक् अपने स्वरूपसे व्यासः—"सत्त्वं रजस्तम इति | उपलब्ध होनेयोग्य नहीं थी । गुण गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।” ( गीता | प्रकृतिके कार्य हैं—यह बात १४ । ५) इति । | "सत्त्व, रज और तम ये प्रकृतिसे | उत्पन्न हुए गुण हैं।" इस वाक्यसे | व्यासजी भी दिखलाते हैं ।