भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कोऽसौ देवो यस्येयं विश्व- | यह विश्वको उत्पन्न करनेवाली जननी शक्तिरभ्युपगम्यत इत्य- | शक्ति जिसकी समझी जाती है वह त्राह—यः कारणानीति । यः | देव कौन है ? इसपर कहते कारणानि निखिलानि तानि पूर्वो- | हैं—'यः कारणानि' इत्यादि । जो क्तानि कालात्मयुक्तानि कालात्म- | एक अद्वितीय परमात्मा पहले बतलाये भ्यां युक्तानि कालपुरुषसंयुक्तानि | हुए कालात्मयुक्त समस्त कारणोंको— स्वभावादीनि 'कालः स्वभावः' | काल और आत्मासे युक्त अर्थात् काल इति मन्त्रोक्तान्यधितिष्ठति नियम- | और पुरुषसे संयुक्त स्वभावादिको, जो यत्येकोऽद्वितीयः परमात्मा तस्य | कि 'कालः स्वभावः' इत्यादि मन्त्रमें शक्तिं कारणमपश्यन्निति वा- | बतलाये गये हैं, अधिष्ठित–नियमित क्यार्थः । | करता है, उसीकी शक्तिको जगत्‌के | कारणरूपसे देखा—ऐसा इस वाक्यका | तात्पर्य है । अथवा देवात्मशक्तिं देवा- | अथवा देवात्मशक्तिम्—देवात्मना त्मनेश्वररूपेणावस्थितां शक्तिम्। | अर्थात् ईश्वररूपसे स्थित शक्तिको तथा च— | देखा; ऐसा ही यह वाक्य भी है— "सर्वभूतेषु सर्वात्म- | "हे सर्वात्मन् ! आपकी जो गुणोंकी न्या शक्तिरपरा तव । | आश्रयभूता अपरा शक्ति समस्त गुणाश्रया नमस्तस्यै | भूतोंमें स्थित है, हे परमेश्वर ! उस शाश्वतायै परेश्वर ॥ | नित्या शक्तिको नमस्कार है । जो यातीतागोचरा वाचां | वाणी तथा मनसे अतीत और अगोचर मनसां चाविशेषणा । | एवं निर्विशेष है तथा ज्ञान और ज्ञानध्यानपरिच्छेद्या | ध्यानसे जिसका भलीभाँति विवेक तां वन्दे देवतां पराम्"॥इति | हो सकता है उस परा देवताकी मैं प्रपञ्चयिष्यति स्वभावादीना- | वन्दना करता हूँ ।" इसके अतिरिक्त | श्रुति स्वभावादि जगत्‌के कारण नहीं हैं,