श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ मकारणत्वमज्ञानस्यैव कारणत्वं अज्ञान ही कारण है—इस बातका आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करेगी; यथा "कोई- "स्वभावमेके कवयो वदन्ति" कोई विद्वान् स्वभावको ही जगत्का कारण बतलाते हैं" इत्यादि, "मायी ( श्वेता० उ० ६ । १ ) इत्यादि। परमेश्वर इस विश्वकी रचना करता "मायी सृजते विश्वमेतत्" है", "एक रुद्र ही है, परमार्थदर्शी ब्रह्मवेत्ता दूसरेकी अपेक्षा नहीं ( श्वेता० उ० ४ । ९ ) । "एको रखते", "वर्ण ( जाति ) आदि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः" विभेदोंसे रहित जिन एकमात्र— अद्वितीय परमात्माने अपनी नाना ( श्वेता० उ० ३।२) । "एकोऽ- प्रकारकी शक्तियोंके योगसे [ अनेकों वर्णोंकी सृष्टि की है ]" इत्यादि । वर्णो बहुधा शक्तियोगात्" [ कैसी शक्तिको देखा ? ] अपने ( श्वेता० उ० ४ । १ ) इत्यादि। गुणोंसे यानी सर्वज्ञत्वादि ईश्वरीय स्वगुणैरीश्वरगुणैः सर्वज्ञत्वादि- गुणोंसे अथवा सत्त्वादि प्रकृतिके गुणोंसे निगूढ देखा; अर्थात् जो भिर्वा सत्त्वादिभिर्निगूढां कार्य- कार्यकारणभावसे रहित पूर्णानन्दा- कारणविनिर्मुक्तपूर्णानन्दाद्वितीय- द्वितीय परब्रह्मसे अभिन्न होनेके कारण उपलब्ध नहीं हो सकती ब्रह्मात्मनैवानुपलभ्यमानाम् । [ ऐसी शक्तिको देखा ] । कोऽसौ देवः ? यः कारणा- वह देव कौन है ? [इसका उत्तर देते हैं—]जो सब कारणोंका अधिष्ठान है— नीत्यादि पूर्ववत् । अथवा देवस्य इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । परमेश्वरस्यात्मभूतां जगदुदय- अथवा देव यानी परमेश्वरकी स्वरूप- भूता अर्थात् जगत्की उत्पत्ति, स्थितिलयहेतुभूतां ब्रह्मविष्णु- स्थिति और लयकी हेतुभूता ब्रह्मा, शिवात्मिकां शक्तिमिति । तथा विष्णु और शिवरूपा शक्तिको देखा । ऐसा ही कहा भी है— चोक्तम्—