भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७

“शक्तयो यस्य देवस्य | “जिस देवकी ब्रह्मा, विष्णु और ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाः” इति। | शिवरूपा शक्तियाँ हैं” इत्यादि तथा “ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्म- | “हे ब्रह्मन् ! ब्रह्मा, विष्णु और शिव— न्प्रधाना ब्रह्मशक्तयः” | ये ब्रह्मकी प्रधान शक्तियाँ हैं” इति च । | इत्यादि । स्वगुणैः सत्त्वरजस्तमोभिः । | ‘स्वगुणैः’ अर्थात् सत्त्व, रज और सत्त्वेन विष्णू रजसा ब्रह्मा तमसा | तमसे युक्त । सत्त्वादि गुणरूप महेश्वरः सत्त्वाद्युपाधिसंबन्धात्स्व- | उपाधिके कारण ही वह सत्त्वसे रूपेण निरुपाधिकपूर्णानन्दाद्वि- | विष्णु, रजसे ब्रह्मा और तमसे महादेव तीयब्रह्मात्मनैवानुपलभ्यमानाः । | कहा जाता है, ये सब स्वतः निरु- परस्यैव ब्रह्मणः सृष्ट्यादिकार्यं | पाधिक पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूपसे कुर्वन्तोऽवस्थाभेदमाश्रित्य शक्ति- | तो उपलब्ध हो ही नहीं सकते । भेदव्यवहारो न पुनस्तत्त्वभेदमा- | ये परब्रह्मके ही सृष्टि आदि कार्य श्रित्य । तथा चोक्तम्— | करते हैं, इसलिये अवस्थाभेदके “सर्गस्थित्यन्तकरणीं | आधारपर इनमें शक्तिभेदका व्यवहार ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम्। | होता है, तात्त्विकभेदके कारण नहीं । स संज्ञां याति भगवा- | ऐसा ही कहा भी है—“वह एक ही नेक एव जनार्दनः” इति । | भगवान् जनार्दन उत्पत्ति, स्थिति ( विष्णुपु० १ । २ । ६६ ) | और संहारकारिणी ब्रह्मा, विष्णु और | शिवरूप संज्ञाओंको प्राप्त हो | जाता है ।” प्रथममीश्वरात्मना मायिरूपे- | परब्रह्म पहले तो ईश्वरस्वरूप णावतिष्ठते ब्रह्म । स पुनर्मूर्ति- | मायामयरूपसे स्थित होता है । रूपेण त्रिधा व्यवतिष्ठते । तेन | फिर वह मूर्त्तरूप होकर तीन च रूपेण सृष्टिस्थितिसंहाररूप- | प्रकारका हो जाता है । उस नियमनादिकार्यं करोति । तथा | त्रिविधरूपसे वह जगत्की उत्पत्ति, | स्थिति, संहार और नियमनादि कार्य | करता है । इसी प्रकार श्रुति भी