श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[मूल संस्कृत-भाष्य]
च श्रुतिः परस्य शक्तिद्वारेण नियमनादिकार्यं दर्शयति— “लोकांनीशत ईशनीभिः प्रत्यङ्- जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः” (श्वेता० उ० ३ । २) इति । ईशनीभिर्जननीभिः परमशक्ति- भिरिति विशेषणात् । “ब्रह्म- विष्णुशिवा ब्रह्मन्प्रधाना ब्रह्म- शक्तयः” इति स्मृतेः परमशक्ति- भिरिति परदेवतानां ग्रहणम् । अथवा देवात्मशक्तिमिति दे- वश्चात्मा च शक्तिश्च यस्य परस्य ब्रह्मणोऽवस्थाभेदास्तां प्रकृति- पुरुषेश्वराणां स्वरूपभूतां ब्रह्म- रूपेणावस्थितां परात्परतरां शक्तिं कारणमपश्यन्निति । तथा च त्रयाणां स्वरूपभूतं प्रदर्शयिष्य- ति—“भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च
[हिन्दी-अनुवाद/व्याख्या]
शक्तिके द्वारा परमात्माके नियमनादि कार्य प्रदर्शित करती है । “परमात्मा अपनी ईशानी शक्तियोंसे लोकोंका शासन करता है, वह सभी प्राणियोंके भीतर विराजमान है । उसने समस्त लोकोंकी सृष्टि करके उसकी रक्षा करते हुए प्रलयकाल आनेपर सबको अपनेमें लीन कर लिया” इत्यादि । यहाँ ‘ईशनीभिः’—उत्पत्तिकारिणी परमशक्तियोंसे ऐसा विशेषण दिया है [ इससे जाना जाता है कि ब्रह्म ही अपनी शक्तियोंद्वारा सृष्टि आदि कार्य करता है ] । तथा “हे ब्रह्मन् ! ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ये ब्रह्मकी प्रधान शक्तियाँ हैं” इस स्मृतिके अनुसार ‘परमशक्तिभिः’ इस पदसे इन परदेवताओंका ही ग्रहण होता है । अथवा ‘देवात्मशक्तिम्’—देवता, आत्मा और शक्ति ये जिस परब्रह्मके अवस्थाभेद हैं उस प्रकृति, पुरुष और ईश्वरकी स्वरूपभूता ब्रह्मरूपसे स्थित परात्पर शक्तिको उन्होंने कारण- रूपसे देखा; ऐसा ही इन तीनोंके स्व- रूपभूत ब्रह्मका “भोक्ता (जीव), भोग्य (प्राकृत प्रपञ्च) और प्रेरक (अन्त- र्यामी) परमात्मा इन तीनोंके स्वरूपको