भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 276 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 8

( ६ ) इसी प्रकार द्वैतवादियोंने भी इस ग्रन्थके वाक्योंसे अपने सिद्धान्तको पुष्ट करनेका प्रयत्न किया है। यों तो अपने सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये वे इसके कई मन्त्र उद्धृत करते हैं; परन्तु उनमें प्रधान चतुर्थ अध्यायके छठे और सातवें मन्त्र ही हैं। वे इस प्रकार हैं— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ इन मन्त्रोंके द्वारा द्वैतवादी आचार्योंने जीव और ईश्वरका भेद सिद्ध करनेकी चेष्टा की है; परन्तु आचार्यने पूर्वमन्त्रके दो सखा सुवर्ण विज्ञानात्मा और परमात्मा तथा द्वितीय मन्त्रके पुरुष और ईश अविद्याग्रस्त जीव और प्रत्यगात्मा बतलाकर उनका केवल औपा- धिक भेद प्रदर्शित करते हुए परमार्थतः एकत्व ही सिद्ध किया है। इस विषयमें शारीरकभाष्यमें भी बड़ा युक्तियुक्त विचार किया गया है। यह सब होते हुए भी यह नहीं कहा जा सकता कि अन्य मताव- लम्बियोंके सिद्धान्त सर्वथा अलीक ही हैं। वस्तुतः परमप्रमाणभूता श्रुति और उसके प्रमेय श्रीभगवान् दोनों ही वाञ्छाकल्पतरु हैं। उन्हें जो जिस भावसे भजता है उसे उनकी उसी रूपमें अनुभूति होती है। उनका परमार्थस्वरूप सर्वथा अनिर्वचनीय और मन-बुद्धि आदिका अविषय है; किन्तु जिस रूपमें उनकी अनुभूति होती है उससे भी उनका किसी प्रकारका भेद नहीं है। इसलिये उसके द्वारा भी उन्हीं- की झाँकी होती है। वे सर्वरूप हैं, सर्वातीत हैं और सबके साक्षी हैं। बस, एकमात्र वे ही वे हैं। जिसे हम उनसे भिन्न समझते हैं वह भी उन्हींकी प्रतिकृति है। वस्तुतः ऐसा कोई देश, काल या पदार्थ नहीं है जो उनसे भिन्न हो और यों किसी भी देश, काल या पदार्थके द्वारा उनका ग्रहण भी नहीं किया जा सकता; सारे मत उन्हींका प्रतिपादन करते हैं और वस्तुतः वे किसी भी मतके विषय भी नहीं हो सकते। यह