भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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( ७ ) एक विचित्र पहेली है। व्यवहारमें किन्हीं भी दो विरुद्ध धर्मोंका सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता; परन्तु यहाँ सारे विरोधोंका समन्वय हो जाता है, क्योंकि वे सर्वाधिष्ठान हैं। यदि यहाँ भी सबका सामञ्जस्य न हुआ तो और हो ही कहाँ सकता है ? अस्तु । इस प्रकार यह उपनिषद् परमार्थतत्त्वके जिज्ञासुओंके लिये बहुत ही उपयोगी है। इसपर शाङ्करभाष्यके अतिरिक्त श्रीशङ्करानन्दकृत दीपिका, श्रीनारायणविरचित दीपिका और श्रीविज्ञानभगवान्कृत विवरणनामक तीन टीकाएँ और हैं। भगवान् शङ्करकी विवेचनशैली बड़ी ही गम्भीर, प्रसादपूर्ण और युक्तियुक्त होती है। उनके पाण्डित्य और युक्तिकौशलको विपक्षी विद्वान् भी मुक्तकण्ठसे स्वीकार करते हैं। परन्तु प्रस्तुत भाष्यमें वह प्रतिभा नहीं देखी जाती। इसमें न वह गाम्भीर्य है, न प्रसाद है और न युक्तिकौशल ही है। इसीसे अधि- कांश विद्वानोंका ऐसा मत है कि यह आचार्यकी रचना नहीं है। किन्हीं अन्य मठस्थ शङ्कराचार्यने इसे लिखकर अपने भाष्यकी प्रतिष्ठा- के लिये भगवान् भाष्यकारके नामसे प्रसिद्ध कर दिया है। इसके आचार्यकृत न होनेमें और भी कई कारण बताये जाते हैं। परन्तु यहाँ उन्हें उद्धृत करनेका कोई विशेष प्रयोजन नहीं है। इस प्रकारकी खोज ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टिसे तो अवश्य बहुत आवश्यक है; परन्तु जिज्ञासुओंका तो मुख्य लक्ष्य अपनी ज्ञानपिपासाकी शान्ति- पर ही होना चाहिये। इसकी रचना कैसी ही शिथिल और प्रसाद- शून्य हो, इसमें कल्याणकामियोंकी शान्तिके लिये पुष्कल सामग्री है। इसलिये इसका अनुशीलन उनके लिये किसी प्रकार अनुपयोगी नहीं हो सकता। इस उपनिषद्के प्रकाशनसे एक चिरकालिक अभिलाषाकी पूर्तिके कारण मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। आजसे प्रायः सात वर्ष पूर्व इन एकादश उपनिषदोंके भाष्यका हिन्दी-अनुवाद करनेका संकल्प हुआ था। भगवत्कृपासे वह संकल्प पूरा हो गया। छान्दोग्यतक नौ उपनिषदोंको प्रकाशित हुए प्रायः दो वर्ष हो गये हैं। बृहदारण्यक