श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
मिष्टत्वात् । तथा चोक्तम्—"इष्टं | वह तो विद्वानोंको इष्ट होनेके कारण हि विदुषां लोके समासव्यास- | है । ऐसा ही कहा भी है— | “लोकमें संक्षेप और विस्तारपूर्वक धारणम्” इति। तथा च श्रुत्यन्तरे | विषयको अवधारण करना विद्वानोंको | इष्ट ही है” इसी प्रकार एक दूसरी सकृच्छ्रुतस्य गोपामितिपदस्य | श्रुतिमें एक बार आये हुए 'गोपाम्' | इस पदकी व्याख्याका भेद स्वयं व्याख्याभेदः श्रुत्यैव प्रदर्शितः— | श्रुतिने ही दिखाया है । वहाँ 'अपश्यं गोपामित्याह प्राणा वै | 'अपश्यं गोपामित्याह प्राणा वै गोपाः' इति। 'अपश्यं गोपामित्याह | गोपाः' ऐसा कहा है, और फिर | दुबारा 'अपश्यं गोपामित्याह असौ वा आदित्यो गोपाः' इति । | असौ वा आदित्यो गोपाः' ऐसा | कहा है । इसी प्रकार 'यह 'अथ कस्मादुच्यते ब्रह्म' इत्यारभ्य | ब्रह्म क्यों कहा जाता है' ऐसा 'बृंहति बृंहयति तस्मादुच्यते | कहकर 'बढ़ा हुआ है और बढ़ाता | है इसलिये यह परब्रह्म कहा जाता परं ब्रह्म' इति सकृच्छ्रुतस्य ब्रह्म- | है' ऐसा कहकर श्रुतिमें एक बार | आये हुए 'ब्रह्म' पदका स्वयं श्रुतिने पदस्य निमित्तोपादानरूपेणार्थ- | ही निमित्त और उपादानभेदसे अर्थ- भेदः श्रुत्यैव दर्शितः ॥३॥ | भेद दिखलाया है ॥३॥
एवं तावद् 'देवात्मशक्तिं' 'यः | इस प्रकार यहाँतक 'परमात्मा- | की शक्तिको देखा' और 'जो
१. मैंने गोपा ( पालन करनेवाले ) का दर्शन किया, प्राण ही गोपा हैं । २. मैंने गोपाका दर्शन किया वह सूर्य ही गोपा हैं ।