भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

[बायाँ स्तम्भ] कारणानि निखिलानि काला- त्मना युक्तान्यधितिष्ठत्येकः' इत्ये- कस्याद्वितीयस्य परमात्मनः स्व- रूपेण शक्तिरूपेण च निमित्त- कारणोपादानकारणत्वं मायित्वे- नेश्वररूपत्वं देवतात्मत्वसर्वज्ञ- त्वादिरूपत्वममायित्वेन सत्य- ज्ञानानन्दाद्वितीय रूपत्वं च समा- सेन श्रुत्यर्थाभ्यामभिहितम् । इदानीं तमेव सर्वात्मानं दर्शयति कार्यकारणयोरनन्यत्वप्रतिपादनेन । “वाचारम्भणं विकारो नाम- धेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६।१।४) इति निदर्श- नेनाद्वितीयापूर्वानपरनेतिनेत्या- त्मकवागगोचराशनायाद्यसंस्पृष्ट- प्रत्यस्तमितभेदचित्सदानन्दब्रह्मा- त्मत्वं प्रदर्शयितुमनाः प्रकृत्यैव प्रपञ्चभ्रान्तामवस्थां प्राप्तस्य पर- ब्रह्मण ईश्वरारत्मना सर्वज्ञत्वाप- हतपाप्मादिरूपेण देवतात्मना


[दायाँ स्तम्भ] अकेले ही काल और आत्माके सहित सबका अधिष्ठान है' इन दो श्रुतिके अर्थोंसे एक ही परमात्माके स्वरूप और शक्तिरूपसे निमित्त और उपादान कारण होनेका, मायावी- रूपसे ईश्वर, देवता और सर्वज्ञादि होनेका और अमायिकरूप- से सत्यज्ञानानन्दस्वरूप एवं अद्वितीय होनेका संक्षेपमें वर्णन किया गया । अब कार्य और कारणकी अभिन्नताका प्रतिपादन करती हुई श्रुति उसीको सर्वरूप दिखलाती है। तथा “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है, केवल मृत्तिका ही सत्य है” इस दृष्टान्तके द्वारा समर्थित जो अद्वितीय, कार्यकारणभावशून्य, नेति-नेतिस्वरूप, वाणीका अविषय, क्षुधादि विकारोंसे असंस्पृष्ट, सर्वभेद- रहित, सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्मतत्त्व है उसे प्रदर्शित करनेकी इच्छासे स्वभावसे ही प्रपञ्चरूप भ्रान्ति- मयी अवस्थाको प्राप्त हुए परब्रह्म- की जो सर्वज्ञत्व और पापशून्यत्वादि- रूप ईश्वरभावसे, ब्रह्मादिरूप