भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 276 में से

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पृष्ठ 87

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३


[वाम भाग / संस्कृत मूल]

ब्रह्मादिरूपेण कार्यादिरूपेण वैश्वानरादिरूपेण च मोक्षापे- क्षितशुद्ध्यर्थम् "स यदि पितृ- लोककामः" (छा० उ० ८। २। १) इति विश्वैश्वर्यार्थाम् "मां वा नित्यं शङ्करं वा प्रयाति" इत्यादिदेवतासायुज्यप्राप्त्यर्थां वैश्वानरादिप्राप्त्यर्थां चोपासना- मशेषलौकिकवैदिककर्मप्रसिद्धिं च दर्शयति । यदि कार्यकारण- रूपेण स्वरूपेण चित्सदानन्दा- द्वितीयब्रह्मात्मना च व्यवस्थितं न स्यात्तदा भोग्यभोक्तृनियन्त्र- भावे संसारमोक्षयोरभाव एव स्यात् । अधिकारिणोऽभावेन साधनभूतस्य प्रपञ्चस्याभावात् । तत्फलदातुश्चेश्वरस्याभावात् । तथा संसारादिहेतुभूतमीश्वरं दर्शयति-"संसारमोक्षस्थितिबन्ध- हेतुः" इति । तथा च संसारमोक्ष-


[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]

देवभावसे, [ आकाशादिरूप ] कार्य- भावसे और वैश्वानरादिरूपसे मोक्षापेक्षित चित्तशुद्धि तथा "यदि वह पितृलोककी कामनावाला होता है" इत्यादि श्रुतिके अनुसार सम्पूर्ण ऐश्वर्यप्राप्ति, "वह सर्वदा मुझे या शंकरको प्राप्त होता है" इत्यादि प्रमाणके अनुसार इष्टदेवसे सायुज्यप्राप्ति एवं वैश्वानरादि भावोंकी प्राप्तिके लिये उपासना है उसको तथा सम्पूर्ण लौकिक-वैदिक कर्म- परम्पराको प्रदर्शित करती है। यदि परमात्मा कार्य-कारणरूपसे और स्वरूपतः सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूप- से स्थित न होता तो भोक्ता, भोग्य और नियन्ताका अभाव हो जानेसे संसार और मोक्षका भी अभाव हो जाता; क्योंकि अधिकारीके न रहनेसे न तो उसका साधनभूत प्रपञ्च रहता है और न उसे साधनका फल देनेवाला ईश्वर ही। तथा "[ ईश्वर ही ] संसार, मोक्ष, स्थिति और बन्धनका हेतु है" यह शास्त्रवाक्य संसारादिके हेतुभूत ईश्वरको सिद्ध करता है । और

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