श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
योरभाव एव स्यात् । तत्सिद्धयर्थं | ईश्वरके न रहनेपर तो संसार और प्रपञ्चाद्यवस्थानं दर्शयति— | मोक्षका अभाव ही हो जाना चाहिये "एकं पादं नोत्क्षिपति | था । अतः उसको सिद्धिके लिये सलिलाद्धंस उच्चरन् । | सनत्सुजातजी भी "एकं पादं स चेदविन्ददानन्दं | नोत्क्षिपति" इत्यादि वाक्यसे यह न सत्यं नानृतं भवेत् " | बतलाते हुए कि "हंस (परमात्मा) इति सनत्सुजातोऽप्येकं पादं | जल ( संसार ) से ऊपर रहते हुए नोत्क्षिपतीत्यादि । तथा च | भी अपना एक पाद नहीं निकालता । श्रुतिः—"पादोऽस्य विश्वा भू- | यदि वह [ स्वरूपभूत ] आनन्दका तानि त्रिपादस्यामृतं दिवि" (छा० | अनुभव करने लगे तो न सत्य उ० ३।१२।६) इति । तत्र प्रथमेन | ( मोक्ष ) ही रहे और न मिथ्या मन्त्रेण सर्वात्मानं ब्रह्म चक्रं | ( संसार ) ही" ईश्वरकी सिद्धिके दर्शयति द्वितीयेन नदीरूपेण— | लिये प्रपञ्चादिकी स्थिति दिखलाते | हैं। ऐसा ही "सम्पूर्ण भूत परमात्मा- | के एक पाद हैं और उसके अमृत- | मय तीन पाद द्युलोकमें हैं" | यह श्रुति भी बतलाती है । यहाँ | श्रुति पहले मन्त्रसे सर्वात्मा ब्रह्मको | चक्ररूपसे और दूसरे मन्त्रसे नदी- | रूपसे प्रदर्शित करती है—
कारण-ब्रह्मका चक्ररूपसे वर्णन
तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः । अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥