श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५ उस एक नेमि, तीन वृत, सोलह अन्त, पचास अरों, बीस प्रत्यरों, छः अष्टकों, विश्वरूप एकपाश, तीन मार्गों, तथा [ पाप-पुण्य ] दोनोंके निमित्तभूत एक मोहवाले कारणको [ उन्होंने देखा* ] ॥ ४ ॥ तमेकेति । य एकः कारणानि | ‘तमेकनेमिम्····’ इत्यादि । जो निखिलान्यधितिष्ठति तमेकनेमिं | अकेला ही समस्त कारणोंमें अधिष्ठित | है, उस एक नेमिवालेको [ उन्होंने योनिः कारणमव्याकृतमाकाशं | देखा । ] जो योनि, कारण, अव्याकृत, परमव्योम माया प्रकृतिः शक्ति- | आकाश, परव्योम, माया, प्रकृति, | शक्ति, तम, अविद्या, छाया, अज्ञान, स्तमोऽविद्या छायाज्ञानमनृतम- | अनृत और अव्यक्त इत्यादि शब्दोंसे व्यक्तमित्येवमादिशब्दैरभिलप्य- | कही जाती है वह एक कारणावस्था | ही जिस अधिष्ठाता अद्वितीय पर- मानैका कारणावस्था नेमिरिव | मात्माकी नेमिके समान नेमि अर्थात् नेमिः सर्वाधारो यस्याधिष्ठातुरद्वि- | सम्पूर्ण कार्यवर्गका आधार है तीयस्य परमात्मनस्तमेकनेमिम् । | ऐसे उस एक नेमिवाले और | ‘त्रिवृतम्’—सत्त्व, रज, तमरूप त्रिवृतं त्रिभिः सत्त्वरजस्तमोभिः | प्रकृतिके तीन गुणोंसे वृत (घिरे प्रकृतिगुणैर्वृतम् । | हुए ) परमात्माको [ कारणरूपसे | देखा ] । षोडशको विकारः पञ्च भूता- | तथा सोलह विकार अर्थात् पाँच न्येकादशेन्द्रियाण्यन्तोऽवसानं | भूत और ग्यारह इन्द्रियाँ—ये जिस | आत्माके अन्त–अवसान यानी विस्तारसमाप्तिर्यस्यात्मनस्तं षोड- | विस्तारकी समाप्ति हैं उस सोलह
- अथवा अगले मन्त्रके क्रियापद ‘अधीमः’ का अध्याहार करके ‘हम जानते हैं’ ऐसा अर्थ करना चाहिये ।