भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

शान्तम् । अथवा प्रश्नोपनिषदि | अन्तोंवाले; अथवा प्रश्नोपनिषद्में "यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभव- | “यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्ति” यहाँसे लेकर “स प्राणमसृजत् न्ति” (६।२) इत्यारभ्य | प्राणाच्छ्रद्धाम्” इत्यादि मन्त्रसे कही "स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धाम्” | हुई जो [ प्राणसे लेकर ] नामपर्यन्त सोलह कलाएँ हैं वे ही जिसका (६।४) इत्यादिना प्रोक्ता | अवसान हैं, [ उस आत्माको कारण- नामान्ताः षोडशकला अवसानं | रूपसे देखा ]। अथवा 'एकनेमिम्' इस यस्येति । अथवैकनेमिमिति का- | पदसे कारणभूता अव्याकृतावस्थाका वर्णन किया गया है, उसके समष्टि- रणभूताव्याकृतावस्थाभिहिता । | कार्यभूत विराट् और सूत्रात्मा ये दो तत्कार्यसमष्टिभूतविराट्सूत्रद्वयं | और व्यष्टिकार्यभूत भूः आदि तद्व्यष्टिभूतभूरादिचतुर्दश भुव- | चौदह भुवन ये सोलह जिस प्रपञ्च- रूपसे स्थित परमात्माके अन्त हैं नान्यन्तोऽवसानं यस्य प्रपञ्चात्म- | उस षोडशान्तको [ कारणरूपसे नावस्थितस्य तं षोडशान्तम् । | देखा ] । शतार्धारम् । पञ्चाशत्प्रत्यय- | पचास अरोंवाले—विपर्यय, भेदा विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्या- | अशक्ति, तुष्टि और सिद्धि नामक ख्या अरा इव यस्य तं शता- | पचास प्रत्ययभेद जिसके अरोंके समान हैं उस पचास अरोंवालेको र्धारम् । पञ्च विपर्ययभेदाः- | [ देखा ] । तम, मोह, महामोह, तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो | तामिस्र और अन्धतामिस्र ये पाँच ह्यन्धतामिस्र इति । अशक्तिरष्टा- | विपर्ययके भेद हैं । अशक्ति अट्ठाईस १. प्रश्नोपनिषद्के षष्ठ प्रश्नमें निम्नलिखित सोलह कलाएँ बतलायी हैं— प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक और नाम। यहाँ 'कला' शब्दका अर्थ इस प्रकार है—कं ब्रह्म लीयते आच्छाद्यते यया, सा कला। अर्थात् जिसके द्वारा क (ब्रह्म) लीन (ढका हुआ) है उसे कला कहते हैं। इन्होंने ब्रह्मके पारमार्थिक स्वरूपको ढक रखा है, इसलिये ये कलाएँ हैं।