भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७ विंशतिधा । तुष्टिर्नवधा । अष्टधा | प्रकारकी है, तुष्टि नौ प्रकारकी सिद्धिः । एते पञ्चाशत्प्रत्यय | और सिद्धि आठ प्रकारकी । ये ही भेदाः । तत्र तमसो भेदोऽष्ट- | पचास प्रत्ययभेद हैं । इनमें तमके विधः । अष्टसु प्रकृतिष्वनात्म- | आठ भेद हैं—अनात्मभूत आठ स्वात्मप्रतिपत्तिविषयभेदेनाष्टविध- | प्रकृतियोंमें आत्मभाव होना यही त्वप्रतिपत्तेः । मोहस्य चाष्ट- | भावोंके विषयभेदके अनुसार आठ विधो भेदः । अणिमादिशक्ति- | प्रकारका तम है । मोहका आठ र्मोहः । दशविधो महामोहः । | प्रकारका भेद है, अणिमादि आठ दृष्टानुश्रविकशब्दादिविषयेषु प- | शक्तियाँ ही मोह हैं । महामोह दश ञ्चसु पञ्चस्वभिनिवेशो महामोहः। | प्रकारका है; दृष्ट ( लौकिक ) और दृष्टानुश्रविकभेदेन तेषां दशवि- | श्रुत ( पारलौकिक ) शब्दादि पाँच- धत्वम् । तामिस्रोऽष्टादशविधः । | पाँच विषयोंमें जो सत्यत्वबुद्धि है दृष्टानुश्रविकेषु दशसु विषयेष्वष्ट- | वही महामोह है, दृष्ट और आनु- विधैरैश्वर्यैः प्रयतमानस्य तदसिद्धौ | श्रविक भेदसे वे दश प्रकारके हैं । यः क्रोधः स तामिस्रोऽभिधीयते । | तामिस्र अठारह प्रकारका है । आठ अन्धतामिस्रोऽप्यष्टादशविधः । | प्रकारके ऐश्वर्योंद्वारा दश प्रकारके अष्टविधैश्वर्ये दशसु विषयेषु | दृष्ट और आनुश्रविक विषयोंके लिये भोग्यत्वेनोपस्थितेष्वर्धभुक्तेषु मृ- | प्रयत्न करते हुए उनकी प्राप्ति न त्युना हियमाणस्य यः शोको | होनेपर जो क्रोध होता है वह तामिस्र | कहलाता है । अन्धतामिस्र भी | अठारह प्रकारका है । आठ प्रकारके | ऐश्वर्य और दशों प्रकारके विषय | भोग्यरूपसे उपस्थित रहनेपर उन्हें | आधे भोगनेपर ही मृत्युके द्वारा | उनसे छुड़ा दिये जानेपर जो ऐसा १. सांख्यशास्त्रानुसार प्रधान, महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा—ये आठ प्रकृतियाँ हैं—इनमें भी प्रधान केवल प्रकृति है और महदादि सात प्रकृति-विकृति हैं । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामें पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकारको भगवान्‌की अष्टधा प्रकृति कहा है । किन्तु आगे ये प्रकृतियाँ प्रकृत्यष्टकमें ली हैं, इसलिये यहाँ पूर्वोक्त सांख्यसम्मत प्रकृतियाँ ही समझनी चाहिये ।