भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 276 में से

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पृष्ठ 92

७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ जायते महता क्लेशेनैते प्राप्ता न चैते | शोक होता है कि मैंने इन्हें बड़े कष्टसे मयोपभुक्ताः प्रत्यासन्नश्चायं मरण- | प्राप्त किया था, मैं इन्हें भोग भी नहीं | पाया कि यह मरणकाल उपस्थित हो काल इति सोऽन्धतामिस्र इत्युच्यते। | गया—इसे अन्धतामिस्र कहते हैं । विपर्ययभेदा व्याख्याताः। | इस प्रकार विपर्ययके भेदोंकी तो अशक्तिरष्टाविंशतिधोच्यते—एका- | व्याख्या हो गयी। अशक्ति अठ्ठाईस दशेन्द्रियाणामशक्तयो मूक- | प्रकारकी कही जाती है। मूकत्व, | बधिरत्व, अन्धत्वादि ग्यारह बाह्य त्वबधिरत्वान्धत्वप्रभृतयो बाह्याः। | अशक्तियाँ तो इन्द्रियोंकी हैं, पुरुषार्थ- अन्तःकरणस्य पुरुषार्थयोग्यता- | की योग्यतास्वरूप तुष्टियोंसे विपरीत नौ तुष्टीनां विपर्ययेण नवधाशक्तिः। | अशक्तियाँ अन्तःकरणकी हैं, और सिद्धीनां विपर्ययेणाष्टधाशक्तिः। | आठ अशक्तियाँ सिद्धियोंसे विपरीत हैं। तुष्टिर्नवधा—प्रकृत्युपादान- | तुष्टि नौ प्रकारकी है—चार कालभाग्याख्याश्चतस्रः । विष- | तो प्रकृति, उपादान, काल और | भाग्य नामवाली तथा पाँच विषयोंसे योपरमात्पञ्च । कश्चि- | उपरति हो जानेसे होती हैं। (१) त्प्रकृतिपरिज्ञानात्कृतार्थोऽस्मीति | कोई पुरुष प्रकृतिका ज्ञान होनेपर मन्यते । अन्यः पुनः पारि- | ही यह मान लेता है कि मैं कृतार्थ हो व्राज्यलिङ्गं गृहीत्वा कृता- | गया। (२) कोई संन्यासके चिह्न | धारण करनेसे ही 'मैं कृतार्थ हो गया' र्थोऽस्मीति मन्यते । अपरः पुनः | ऐसा अपनेको मानने लगता है। प्रकृतिपरिज्ञानेन किमाश्रमाद्युपा- | (३) कोई प्रकृतिका ज्ञान होनेपर | ऐसा मानकर सन्तुष्ट हो जाता है कि दानेन वा किं बहुना कालेन | अब संन्यासाश्रमादि ग्रहण करने- अवश्यं मुक्तिर्भविष्यतीति मत्वा परि- | की क्या आवश्यकता है, बहुत काल | बीतनेपर अब तो अवश्य मुक्ति हो तुष्यति । कश्चित्पुनर्मन्यते विना | ही जायगी। (४) कोई ऐसा मानने