श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९ भाग्येन न किञ्चिदपि प्राप्यते । | लगता है कि बिना भाग्यके कुछ यदि मम भाग्यमस्ति ततो भवत्ये- | भी नहीं मिलता, यदि मेरा भाग्य होगा वात्रैव मोक्ष इति परितुष्यति । | तो मुझे अवश्य यहीं मोक्ष प्राप्त हो विषयाणामार्जनमशक्यमित्युपरम्य | जायगा—ऐसा समझकर वह सन्तुष्ट तुष्यति । शक्यते द्रष्टुमार्जितु- | हो जाता है । ( ५ ) कोई यह मान- मार्जितस्य रक्षणमशक्यमित्युपरम्य | कर कि विषयोंका उपार्जन करना | असम्भव है, उपरत होकर सन्तुष्ट परितुष्यति । सातिशयत्वादिदोष- | हो जाता है । ( ६ ) कोई यह | सोचकर कि विषयोंका दर्शन और दर्शनेनोपरम्य परस्तुष्यति । वि- | उपार्जन तो सम्भव है, परन्तु उपार्जित | विषयोंकी रक्षा करना सम्भव नहीं है, षयाः सुतरामेवाभिलापं जनयन्ति | उनसे उपरत होकर सन्तोष कर न च तद्भोगाभ्यासे तृप्तिरुप- | लेता है । ( ७ ) कोई विषयोंमें जायते । | न्यूनाधिकतादि दोष देखनेसे उनसे | उपरत होकर सन्तुष्ट हो जाता है । “न जातु कामः कामाना- | ( ८ ) विषय तो तत्सम्बन्धी मुपभोगेन शाम्यति । | अभिलाषाको ही उत्पन्न करते हैं, हविषा कृष्णवर्त्मेव | उनके पुनः-पुनः भोगसे कभी तृप्ति | नहीं होती, “विषयोंकी इच्छा उनके भूय एवाभिवर्धते ॥” | भोगसे कभी शान्त नहीं होती, अपितु (श्रीमद्भा० ९ । १९ । १४) | घृतसे अग्निके समान वह और भी बढ़ | जाती है ।” अतः पुनः-पुनः इति । तस्मादलमेनैन पुनः पुनः | असन्तोषके हेतुभूत इन विषयोंके भोग- | को छोड़ो—इस प्रकार विषयासक्तिमें दोष रसन्तोषकारणेनोपभोगेनेत्येवं सङ्ग- | देखकर कोई उनसे उपरत होकर दोषदर्शनादुपरम्य कश्चित्तुष्यति । | सन्तोष कर लेता है । ( ९ ) जीवों- नानुपहृत्य भूतान्युपभोगः संभ- | की हिंसा किये बिना भोग मिलना