भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

८० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ वति। भूतोपघातभोगाच्चाधर्मः। | सम्भव नहीं है और जीवहिंसापूर्वक अधर्मान्नरकादिप्राप्तिरिति हिंसा- | भोग भोगनेसे अधर्म होगा तथा | अधर्मसे नरकादिकी प्राप्ति होगी। दोषदर्शनात्कश्चिदुपरम्य तुष्यति। | इस प्रकार हिंसारूप दोष देखकर | कोई उनसे उपरत होकर सन्तोष प्रकृत्युपादानकालभाग्याश्चतस्रः। | कर लेता है। इस प्रकार प्रकृति, | उपादान, काल और भाग्यनामक विषयाणामार्जनरक्षणविषयदोष- | चार एवं विषयोंके उपार्जन, रक्षण, | विषयतारतम्यरूप दोष, संग और सङ्गहिंसादोषात्पञ्च तुष्टय इति | हिंसा इन दोषोंके कारण होनेवाली | पाँच—ऐसी इन नौ तुष्टियोंकी नव तुष्टयो व्याख्याताः। | व्याख्या कर दी गयी। सिद्धयोऽभिधीयन्ते—ऊहः श- | अब सिद्धियाँ बतलायी जाती ब्दोऽध्ययनमिति तिस्रः सिद्धयः। | हैं—तीन सिद्धियाँ तो ऊह, | शब्द और अध्ययन नामकी हैं, दुःखविघातास्तिस्रः। सुहृत्प्राप्ति- | तीन दुःखविघात नामवाली हैं र्दानमिति सिद्धिद्वयम्। ऊहस्त- | और दो सुहृत्प्राप्ति एवं दान हैं। त्त्वं जिज्ञासमानस्योपदेशमन्तरेण | ऊह—तत्त्वजिज्ञासुको उपदेशके जन्मान्तरसंस्कारवशात्प्रकृत्यादि- | बिना ही जन्मान्तरके संस्कारसे जो विषयं ज्ञानमुत्पद्यते सेयमूहो | प्रकृति आदिके विषयमें ज्ञान उत्पन्न | हो जाता है वह ऊह नामकी पहली नाम प्रथमा सिद्धिः। शब्दो नामा- | सिद्धि है। बिना अभ्यासके केवल भ्यासमन्तरेण श्रवणमात्राद्यज्ज्ञा- | श्रवणमात्रसे ही जो ज्ञान उत्पन्न हो नमुत्पद्यते सा द्वितीया सिद्धिः। | जाता है वह शब्द नामकी दूसरी | सिद्धि है। शास्त्रके अभ्याससे जो ज्ञान अध्ययनं नाम शास्त्राभ्यासाद्य- | उत्पन्न हो जाता है उसे अध्ययन ज्ज्ञानमुत्पद्यते सा तृतीया सिद्धिः। | कहते हैं, यह तीसरी सिद्धि है।