श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१ आध्यात्मिकस्याधिभौतिकस्याधि- आध्यात्मिक, आधिभौतिक और दैविकस्य त्रिविधदुःखस्य व्युदा- आधिदैविक इन त्रिविध दुःखोंकी साच्छीतोष्णादिजन्यदुःखसहिष्णोः उपेक्षा करनेसे शीतोष्णादिजनित तितिक्षोर्यज्ज्ञानमुत्पद्यते तस्य दुःख सहन करनेवाले तितिक्षु पुरुष- आध्यात्मिकादिभेदात्सिद्धेस्त्रैवि- को जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह ध्यम् । सुहृदं प्राप्य या सिद्धि- दुःखविघात नामकी सिद्धि है; र्ज्ञानस्य सा सुहृत्प्राप्तिर्नाम आध्यात्मिकादि भेदके कारण इस सिद्धिः। आचार्यहितवस्तुप्रदानेन सिद्धिके भी तीन प्रकार हैं । किसी या सिद्धिर्विद्यायाः सा दानं नाम सुहृद्के प्राप्त होनेपर जो ज्ञानकी सिद्धिः। एवमष्टविधा सिद्धिर्व्या- सिद्धि होती है वह सुहृत्प्राप्ति नामकी ख्याता । सिद्धि है । आचार्यको उनकी प्रिय वस्तु दान करनेसे जो ज्ञानकी प्राप्ति होती है वह दान नामकी सिद्धि है। इस प्रकार आठ प्रकारकी सिद्धियों- की भी व्याख्या की गयी । एवं विपर्ययाशक्तितुष्टि- इस तरह यह विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि सिद्धाख्याः पञ्चाशत्प्रत्यय- और सिद्धि नामक पचास प्रत्ययभेदोंकी भेदा व्याख्याताः । एवं ब्राह्म- व्याख्या हुई । ब्राह्मपुराणमें कल्पो- पुराणे कल्पोपनिषद् व्याख्यान- पनिषद्की व्याख्याके प्रसङ्गमें साठवें प्रदेशे षष्टितमाध्याये पञ्चाशत् अध्यायमें पचास प्रत्ययभेदोंकी इसी प्रत्ययभेदाः प्रतिपादिताः । अथवा प्रकार व्याख्या की गयी है । अथवा “पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः”इति परस्य “पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः” इस पुराण- याः शक्तयः पुराणे स्वरूपत्वेना- वाक्यमें परमात्माकी जिन शक्तियोंका भिमताः पञ्चाशच्छक्तय अरा इव उनके स्वरूपरूपसे वर्णन किया है यस्य तं शतारारम् । वे ही जिसके अरोंके समान हैं उस शतारार ( पचास अरोंवाले ) को [ कारणरूपसे देखा ] ।