भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 222 में से

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ध्यान के फलस्वरूप उसकी जैविक और मानसिक शक्ति विकसित होती है, उसका शरीर तेजोमय और कान्तियुक्त हो जाता है । अवशिष्टे षोडशे ब्रह्मरन्ध्र आकाशचक्रं तत्र श्रीगुरुचरणा- म्बुजयुग्मं सदावलोकयेदाकाशवत्पूर्णो भवति । इति षोडशा- धारः ॥ २५ ॥ शेष सोलहवाँ ब्रह्मरन्ध्र आधार है । यह आकाशचक्र का स्थान है । इसमें श्रीगुरुके दोनों चरण-कमलों का ध्यान करना चाहिये । इससे साधक आकाश की तरह पूर्ण रूप से ( निरवच्छिन्न सच्चिदानन्दस्वरूप गुरुतत्व का ध्यान करने से ) व्यापक—मुक्त हो जाता है ॥ २५ ॥ विशेष—ब्रह्मरन्ध्र आधार में आकाशचक्र ही गुरु-स्वरूप के ध्यान के लिये उपयुक्त स्थान स्वीकार किया गया है, इस आधार में गुरु के चरण का ध्यान करने से उनकी प्रसन्नता से परमात्म-ज्योति अभिव्यक्त हो उठती है । इस स्थान में जब मानसिक और जैविक शक्तियों का उच्च से उच्चतर स्तर की समाधि द्वारा साधक पूर्ण न्यास ( संस्थापन ) करता है, तब उसे गुरु का प्रसाद ( प्रसन्नता ) प्राप्त होता है । गुरु अपने स्वरूप में सच्चिदानन्दविग्रह है और व्यष्टिरूप में शिवशक्ति का रूप है । योगसाधक गुरु के प्रसाद से शाश्वत, सनातन, अलख- निरञ्जन, कैवल्यपद-स्वरूपावस्थित हो जाता है । आकाशचक्र पूर्ण-गिरि-पीठ है, इसमें साधक परमशून्य परमात्मरूप में तादात्म्य-लाभ कर गुरु के प्रसाद से साक्षात् शिवस्वरूप हो जाता है । गुरु के चरण-कमल का ध्यान करने से उसका सदुपदेशामृत सहज प्राप्त होता है । भवेद् वीर्यवती विद्या गुरुवक्त्रसमुद्भवा । ( शिवसंहिता ३ । ११ ) गुरु का स्वरूप नादविन्दु-कलातीत होने पर सम्पूर्ण स्वानन्द-विग्रह होता है और रूप नादविन्दुकलात्मा होने पर शिवस्वरूप होता है । दोनों स्वरूपों में पूर्ण तादात्म्य है । गुरु के चरण-कमल का ध्यान ब्रह्मरन्ध्राधार में पूर्ण विहित है, इससे साधक निरञ्जन पद प्राप्त करता है । नमः शिवाय गुरवे नादविन्दुकलात्मने । निरञ्जनपदं याति नित्यं यत्र परायणः ।। ( हठयोगप्रदीपिका ४ । १ ) ६२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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