सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहायोगो गोरखनाथ ने अपनी 'गोरक्षशतक' रचना के प्रारम्भ में दो श्लोकों में गुरु का ध्यान किया है, वन्दन किया है, पहले श्लोक में गुरु के स्वानन्द विग्रह का ध्यान है, दूसरे में समस्त योगज्ञान में पारंगत परम गुरु मत्स्येन्द्रनाथ की बन्दना है । श्रीगुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्दविग्रहम् । यस्य सान्निध्यमात्रेण चिदानन्दायते तनुः ॥ अन्तर्निश्चलितात्मदीपकलिका स्वाधारवेधादिभि । र्यो योगी युगकल्पकालकलनातत्वं च जेगीयते ॥ ज्ञानामोदमहोदधिः समभवद् यत्रादिनाथः स्वयं । व्यक्ताव्यक्तगुणाधिकं तमनिशं श्रीमीननाथं भजे ॥ ( गोरक्षशतक १-२ ) गुरु साक्षात् आदिनाथस्वरूप है, इस भाव के द्वारा उन्होंने मत्स्येन्द्रनाथ (मीननाथ) के चरण-कमल का चिन्तन किया है । गोरखनाथजी ने गुरु- चरणकमल की वन्दना से आत्मब्रह्मदर्शन किया है । प्रथमें प्रणऊँ गुर के पाया । जिन मोहि आत्मब्रह्म लखाया । सतगुरु सवद कह्या तैं बूझया । तूहूँ लोक दीपकमनि सूझया ॥ ( गो० वा० प्राणसंकली १ ) गोरखनाथजी ने इस तरह स्वीकार किया है कि सबसे पहले मैं गुरुदेव (योगिराजेश्वर मत्स्येन्द्र नाथ) के चरण (कमल) में प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने (कृपापूर्वक) मुझे अपने ही शरीर में विद्यमान आत्मब्रह्म, अलख निरञ्जन परम शिव का (ज्ञाननेत्र से) साक्षात्कार अथवा दर्शन कराया । सद्गुरु के शब्द उपदेशामृत) से मुझे (ज्ञान-) दीपमणि की प्राप्ति हो गयी और तीनों लोक मेरे ज्ञाननेत्र में प्रकाशित हो गये । इस तरह सोलह आधारों के योग-साधनापरक ध्यान का वर्णन किया गया । तीन लक्ष्य अथ लक्ष्यत्रयन्तत्रतावदन्तर्लक्ष्यं कथ्यते । मूलकन्दाद् दण्डलग्नां ब्रह्मनाड़ीं श्वेतवर्णां ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं गतां संस्मरेत् सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६३