भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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तन्मध्ये कमलतन्तुनिभां विद्युत्कोटिप्रभामूर्ध्वगामिनीं तां मूर्तिं मनसा ध्यायेत् तत्र सर्वसिद्धिदा भवति ॥ २६ ॥ ( मन को स्थिर करने के उपाय का निरूपण किया जाता है । मन को वश मे करने से इष्ट की—अभिलषित ध्येय की सिद्धि होती है ।) अन्तर, बहिः और मध्य के भेद से तीन प्रकार से लक्ष्यों का वर्णन किया जाता है । (अन्तर लक्ष्य का वर्णन है। मूल कन्द मेढ्र के ऊपरी भाग और नाभि के नीचे पक्षी के अण्डे के समान स्थित है । इस मूलकन्द से बहत्तर हजार नाड़ियों की उत्पत्ति कही गयी है । ) मूलकन्द से सहस्रार पर्यन्त मेरुदण्ड में श्वेतवर्ण की ब्रह्मनाड़ी सुषुम्ना का ध्यान करना चाहिये, उस सुषुम्ना में कमल-तन्तु के समान करोड़ों बिजलियों के समान प्रकाशमयी ऊर्ध्वगामिनी कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करना चाहिये । इस ध्यान से कुण्डलिनी समस्त सिद्धियों को प्रदान करती है ॥ २६ ॥ विशेष—महायोगी गोरखनाथजी की दृष्टि में लक्ष्य वे विषय हैं, जिनपर मानसिक-जैविक शक्ति को उच्चतम आध्यात्मिक स्तर पर उठाने और ब्रह्माण्ड तथा व्यष्टि-शरीर में परमात्म-सत्ता का दर्शन करने के लिये अस्थायी रूप से ध्यान केन्द्रित किया जाता है । समाधि या धारणा के चुने हुए पदार्थ की स्थिति के अनुसार भीतरी, बाहरी और मध्य, तीन तरह के लक्ष्य निरूपित हैं । सुषुम्ना नाड़ी में कुण्डलिनी शक्ति पर ध्यान केन्द्रित करना अन्तर्लक्ष्य-साधना है । यह कुण्डलिनी इस तरह लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करने वाले योगसाधक को महेश्वरी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में अभिव्यक्त होकर अनेक प्रकार के आध्यात्मिक और लौकिक वरदान तथा सिद्धियाँ प्रदान करती है । शिवस्वरूप में तादात्म्य होने पर वह साधक को दिव्य स्वरूप में अवस्थित कर देती है । जब मन आन्तरिक आत्मा पर केन्द्रित हो जाता है, तब न केवल मन ही, प्रत्युत शरीर भी इसके आध्यात्मिक स्वरूप के प्रकट हो जाने पर दिव्य हो जाता है । अथवा ललाटोर्ध्वे गोल्लातमण्डपे स्फुरदाकारं लक्षयेदथवा भ्रमरगुहामध्य आरक्तभ्रमराकारं लक्षयेदथवा कर्णद्वयं तर्जनीभ्यां निरोधयेत् ततः शिरोमध्ये धूं धूं कारं नादं शृणोत्यथवा चक्षुर्मध्ये नीलज्योतिरूपं पुतल्याकार लक्षयेदित्यन्त- र्लक्ष्यम् ॥ २७ ॥ ६४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति