सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुक्तिप्रदं भवत्यथवा दृष्ट्यन्तस्तप्तकाञ्चनसन्निभां भूमिं लक्षयेद् दृष्टि : स्थिरा भवति । इत्यनेकविध बहिर्लक्ष्यम् ॥ २८ ॥ बाहरी लक्ष्य का निरूपण किया जाता है । नासिका के अग्रभाग में दो अंगुल आगे लाल रंग के तेज का ध्यान करना चाहिये अथवा नासिका से दस अंगुल आगे तरंगयुक्त श्वेत वर्ण के जलतत्व का ध्यान करना चाहिये अथवा नासाग्र से द्वादश अंगुल की दूरी पर पीले रंग के पृथ्वीतत्व का ध्यान करना चाहिये अथवा आकाश के सम्मुख दृष्टि कर आकाश का ध्यान करना चाहिये । इस तरह साधक ज्योतिः पुंज को देखता है, जिससे चित्त आकाश की तरह निर्मल और व्यापक हो जाता है अथवा ऊपर आकाश की ओर दृष्टि कर आकाश का ध्यान करने से चित्त आकाश की तरह मुक्तिप्रद हो जाता है अथवा दृष्टि को अन्तर्मुखी कर तप्त सोने की रंगवाली पृथ्वी का ध्यान करने से दृष्टि स्थिर होती है । इस तरह अनेक बहिर्लक्ष्य पर ध्यान एकाग्र करने का वर्णन किया गया ॥ २८ ॥ विशेष--खुले नेत्र से साधक अपने मन को बाह्य जगत् की समस्त विभिन्नताओं से मुक्त कर अपनी एकाग्र शक्ति से स्वर्णिम ज्योति के विशाल क्षेत्र में संयमित कर परमात्मा के दिव्य साक्षात्कार से अपने-आप को कृतार्थ कर सकता है । समस्त बाह्य तत्वों ( पदार्थों ) में मन की एकाग्रता द्वारा साधक परमात्मा की अभिव्यक्ति का अनुभव करता है , बाह्य लक्ष्य दृष्टि की स्थिरता अथवा मन की एकाग्रता अथवा ध्यान की तल्लीनता की यही सार्थकता है । वाह्य लक्ष्य में सूर्य, चन्द्र, विशेष तारा, नक्षत्र, ग्रह, जलते दीपक, प्रज्वलित अग्नि, दिव्य प्रतिमा, पूज्य व्यक्ति के चित्र आदि पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये । अथ मध्यमं लक्ष्यं कथ्यते श्वेतवर्णं वा रक्तवर्णं वा कृष्णवर्णं वाग्निशिखाकारं वा ज्योतीरूपं वा विद्युदाकारं वा सूर्यमण्डलाकारं वार्धचन्द्राकारं वा यथेष्टं स्वपिण्डमात्रं स्थानवर्जितं मनसा लक्षयेदित्यनेकविधं मध्यमं लक्ष्यम् ॥ २६ ॥ मध्य लक्ष्य का निरूपण किया जाता है । इसमें स्थानविशेष पर लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित नहीं किया जाता है, किसी श्वेतरंग या लालरंग या काले रंग के पदार्थ पर अथवा अग्निशिखा के आकार वाले पदार्थ पर अथवा ज्योति अथवा विद्युत् के ( समान प्रभावुक्त ) आकार अथवा सूर्यमण्डलाकार अथवा अर्धचन्द्राकार ६६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति