भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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अथवा अपने शरीर में ही यथेष्ट अंग पर मन को एकाग्र—स्थिर कर ( बिना किसी स्थान विशेष की कल्पना के ही ) ध्यान को केन्द्रित करना चाहिये । इस तरह अनेक प्रकार के मध्यम लक्ष्य पर ध्यान एकाग्र करने का वर्णन किया जाता है ॥ २६ ॥ विशेष—मध्यम लक्ष्य का तात्पर्य है विशेष ध्यान का कोई पदार्थ, जिसे न तो शरीर के भीतर कल्पित किया जाता है और न बाहर, न मनको जिस पर बिना किसी स्थान पर उसका संकेत पाये केन्द्रित करना होता है । एक विशेष पदार्थ का विचार मनमें सयत कर सम्पूर्ण ध्यान इसी पर केन्द्रित किया जाता है । पदार्थ का चुनाव साधक की अभिरुचि पर निर्भर है । लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करने से मन की चंचलता मिट जाती है । ध्यान एकाग्र करने का पदार्थ वास्तविक या काल्पनिक तेजोमय अथवा शीतल, आकाररहित अथवा आकारसहित हो सकता है । लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखने की अवधि में योगसाधक को यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि उसे अपने भीतर ( शरीर के भीतर ) तथा ब्रह्माण्ड- व्यवस्था के भीतर सभी स्तरों की प्रापंचिक सत्ताओं में शिवशक्ति के आनन्दमय तादात्म्य का साक्षात्कार करना है तथा स्वरूपानन्द में तल्लीन होना है । व्योमपंचक अथ व्योमपञ्चकं लक्षयेदाकाशं पराकाशं महाकाशं तत्त्वाकाशं सूर्याकाशमिति व्योमपञ्चकं बाह्याभ्यन्तरेऽत्यन्त निर्मलं निराकारमाकाशं लक्षयेदथवा बाह्याभ्यन्तरेऽत्यन्तान्ध कारनिभं पराकाशमवलोकयेदथवाभ्यन्तरकालानलसंकाशं महाकाशमवलोकयेदथवा बाह्याभ्यन्तरे निजतत्त्वस्वरूपं तत्त्वा- काशमवलोकयेदथवा बाह्याभ्यन्तरे सूर्यकोटिनिभं सूर्याकाश- मवलोकयेत् स्वयं व्योमपञ्चकावलोकनेन व्योमसदृशो भवति ॥३०॥ ( आत्मा का स्वरूप आकाश की तरह व्यापक है । उस आत्मा की स्वरूपाभिव्यक्ति के लिये ध्येयरूप पाँच आकाश का ध्यान निर्दिष्ट किया जाता है ।) आकाश, पराकाश, महाकाश, तत्वाकाश और सूर्याकाश—आकाश के पाँच भेद हैं, यही व्योमपंचक कहा जाता है । शरीर के बाहर-भीतर अत्यन्त निर्मल सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६७