सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिराकार आकाश का ध्यान करना चाहिये अथवा शरीर के बाहर-भीतर अत्यन्त अन्धकारमय पराकाश का ध्यान करना चाहिये, शरोर के भीतर प्रलयकाल की अग्नि के समान महाकाश का ध्यान करना चाहिये अथवा (चिदाकाश) तत्वाकाश का ध्यान करना चाहिये; अथवा शरीर के बाहर-भीतर करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमय सूर्याकाश का ध्यान करना चाहिये । इस तरह साधक पाँचों आकाश का ध्यान कर आकाश के समान निर्मल, व्यापक, तेजोमय और दिव्य हो जाता है ॥ ३० ॥ विशेष—मन को आकाश या शून्य पर एकाग्र करने से व्यावहारिक व्यष्टि- चेतना की शुद्धि होती है । वह चेतना व्योम में समान सर्वव्यापक हो जाती है । उक्तं च— नवचक्रं कलाधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् । सम्यगेतन्न जानाति स योगी नामधारकः ॥ ३१ ॥ जो योगी शरीर में स्थित नौ चक्र, सोलह आधार, तीनों लक्ष्य और पाँचों व्योम को अच्छी तरह नहीं जानता है, वह नाम मात्र से ही योगी है, योगतत्त्वज्ञ नहीं है ॥ ३१ ॥ अष्टांगयोग यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टां- वङ्गानि । यम इति उपशमः सर्वेन्द्रियजयआहारनिद्राशीत- वातातपजयश्चैवं शनैः शनैः साधयेत् ॥ ३२ ॥ (अष्टांगयोग का वर्णन किया जाता है ।) यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये ही योग के आठ अंग हैं । यम का आशय है उपशम (इन्द्रियादि को वश में रखकर शान्ति) प्राप्त करना । साधक को धीरे-धीरे यथाक्रम समस्त इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों की ओर से मोड़कर आत्मचिन्तन में लगाकर उन्हें वश में रखकर आहार, निद्रा, शीत, वात और आतप आदि द्वन्द्वों को नियन्त्रित कर (युक्ताहारविहार-पूर्वक) योगसाधना में तत्पर होना चाहिये ॥ ३२ ॥ ६८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति