भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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विशेष—यद्यपि सिद्धमत अथवा नाथयोग-परम्परा में यम-नियमव्यतिरिक्त आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के रूप में षडंगयोग की साधना पर ही विशद विवेचन उपलब्ध होता है तथापि जीवमात्र की सुगमता को ध्यान में रखकर योगसाधक के लिये महाकारुणिक गोरखनाथजी ने सिद्ध- सिद्धान्तपद्धति में अष्टांगयोग पर प्रकाश डालकर यम और नियम की सदुपयोगिता और सार्थकता को महत्व दिया है। षडंगयोग के प्रतिपादन में गोरखनाथजी के वचन हैं : आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा । ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि वदन्ति षट् ॥ ( गोरक्षशतक ७ ) अष्टांगयोग के अंगों का दत्तात्रेय-संहिता में विवेचन है : यमश्चनियमश्चैव आसनं च ततः परम् । प्राणायामश्चतुर्थः स्यात् प्रत्याहारश्च पञ्चमः ॥ षष्ठी तु धारणा प्रोक्ता ध्यानं सप्तममुच्यते । एवमष्टाङ्गयोगं च याज्ञवल्क्यादयो विदुः ॥ ( दत्तात्रेयसंहिता ) गोरखनाथजी के अष्टांग-योगानुक्रम और महर्षि पतञ्जलि के क्रमनिरूपण में सम्पूर्ण तादात्म्य है । यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि । ( पातञ्जलयोगदर्शन २ । २६ ) महर्षि पतञ्जलि ने यम पाँच माने हैं। वे अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ( संग्रह-अभाव ) हैं। अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः । ( पातञ्जलयोग० २ । ३० ) नाथयोगपरम्परा के योगशास्त्र में दस यमों की स्वीकृति है। हठयोग- प्रदीपिका में वर्णन है : अहिंसासत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं क्षमा धृतिः । दयार्जवं मिताहारः शौचं चैव यमा दश ॥ ( हठयोगप्रदीपिका १ । १७ ) सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६६