सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनियमा दशसंप्रोक्ता योगशास्त्रविशारदैः । ( हठयोग० १ । १८ ) हठयोगप्रदीपिका का कथन शिवसंहिता-सम्मत है । नियम-पालन के सम्बन्ध में भगवान् शिव का स्पष्ट आदेश है कि सिद्धान्तग्रन्थों का श्रवण करना चाहिये । परमेश्वर सर्वव्यापक का नाम-संकीर्तन करना चाहिये, शुभ को ही कानों से सुनना चाहिये, धृति, क्षमा, तप, शौच और लज्जा का ध्यान रखना चाहिये, गुरु का सेवन करना चाहिये । वैराग्य भाव से घर में रहना चाहिये । सिद्धान्तश्रवणं नित्यं वैराग्यगृहसेवनम् । नामसङ्कीर्तनं विष्णोः सुसादश्रवणं परम् ॥ धृतिः क्षमा तपः शौचं ह्रीर्मतिगुरुसेवनम् । सदैतांश्च परं योगी नियमांश्च समाचरेत् ॥ ( शिवसंहिता ३।४१-४२ ) इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति रचना में गोरखनाथजी ने दस नियमों को ध्यान में रख कर उन्हें पाँच प्रकार के लक्षित किये हैं । एकान्तवास, उदासीनता, यथा- प्राप्ति संतुष्टि, वैरत्याग, और गुरुचरणाश्रय । एकान्तवास का अभिप्राय है जन- सम्पर्क से दूर रह कर योगमठ आदि के वातावरण में कुटी का निर्माण कर उसमें निवास करते हुए विषय-भोग में आसक्त न होना। सर्वथा निःसंग रहना । उदासीन और द्वन्द्वों में तटस्थ रहकर निःस्पृह भाव से साधन में तत्परता ही उदासीनता है । शत्रु और मित्र में समान भाव रखकर मन में कभी राग-द्वेष न उत्पन्न होने देना ही वैर का अभाव है । जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसी में सन्तुष्ट और प्रसन्न रहना यथाप्राप्ति-संतुष्टि है और गुरु के प्रसाद — प्रसन्नता से ही उनकी सेवा में प्रवृत्त रहने से योगसाधक को स्वरूपावस्थान की प्राप्ति होती है । एकान्तवास, निःसंगता के सम्बन्ध में श्रीमद्भगवद्गीता का कथन है— योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ ( गीता ६।१० ) मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी को अकेला ही एकान्त स्थान में निवास कर आत्मा को निरन्तर परमात्मा में लगाना चाहिये । गीता के ही बारहवें अध्याय के १८ वें, श्लोक के- सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७१