भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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'अनिकेतः स्थिरमतिः' वचन से यह भाव स्पष्ट हो जाता है। उदासीनता के सम्बन्ध में गीता में विवेचन है कि जो साधक समस्त कामनाओं का त्याग कर ममता-अहंकारस्पृहारहित होकर जीवन-यापन करता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है। विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ( गीता २।७१ ) यथाप्राप्ति संतुष्टि का आशय है दुःखों की प्राप्ति होने पर मन में उद्वेग न होना, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह रहना। दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। ( गीता २।५६ ) इसी भाव का गीता में स्पष्टीकरण किया गया है। अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः । ( गीता १२।१६ ) गोरखनाथजी ने रागद्वेष से ऊपर उठजाना साधक के लिए बहुत आवश्यक नियम बताया है। जो सर्वत्र स्नेह ( राग ) रहित होकर शुभ-अशुभ वस्तु की प्राप्ति में न प्रसन्न होता है, न द्वेष करता है, वही स्थिरबुद्धि साधक है। ऐसा पुरुष न किसी से द्वेष करता है, न किसी में रागयुक्त होता है। समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ ( गीता १२।१८ ) गोरखनाथजी ने गुरु के चरणाश्रय में साधक के शरीर का चिन्मय होना स्वीकार किया है, चिन्मयता का अर्थ स्वरूप में स्थिति है। गोरखनाथजी का कथन है। सतगुरु मिलै तो सांसा भागै। मूल विचार्या माहीं ॥ ( गो० बानी ग्यानतिलक ४० ) ७२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति